अतिरिक्त जमीन की बिक्री एक बार शून्य घोषित हो गई तो रद्दीकरण कानून से दोबारा वैध नहीं हो सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि शहरी भूमि सीमा एवं विनियमन अधिनियम, 1976 के तहत अतिरिक्त घोषित जमीन की ऐसी बिक्री, जिसे कानून के तहत शून्य माना गया हो, शहरी भूमि सीमा एवं विनियमन निरसन अधिनियम, 1999 के लागू होने से दोबारा वैध नहीं हो सकती।
कोर्ट ने कहा कि 1976 के कानून के तहत जिस समय जमीन का हस्तांतरण हुआ, उस समय यदि वह कानूनन शून्य था तो 1999 का निरसन कानून उस बिक्री को दोबारा जीवित नहीं कर सकता।
जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने कहा कि 1976 के अधिनियम की धारा 10(4) के तहत निर्धारित अवधि में अतिरिक्त खाली जमीन का किया गया कोई भी हस्तांतरण शून्य माना जाता है। 1999 के निरसन अधिनियम में ऐसे हस्तांतरणों के बारे में कोई अलग प्रावधान नहीं है। ऐसे में सामान्य उपबंध अधिनियम, 1897 की धारा 6 लागू होगी, जिसके अनुसार किसी कानून को निरस्त किए जाने से उस कानून के पहले के संचालन पर असर नहीं पड़ता।
खंडपीठ ने कहा कि यदि जमीन मालिक द्वारा अतिरिक्त जमीन का हस्तांतरण उस समय लागू कानून के तहत शून्य था, तो 1999 का निरसन अधिनियम उस हस्तांतरण को वैधता नहीं दे सकता और न ही उस प्रावधान के प्रभाव को खत्म कर सकता है, जिसके तहत बिक्री शून्य घोषित हुई। कोर्ट ने इसी आधार पर याचिकाकर्ता के पक्ष में 10 नवंबर 1987 को की गई बिक्री को 1976 के अधिनियम की धारा 10(4) से प्रभावित और शून्य माना।
मामला बरेली में स्कूल चलाने वाली एक सोसाइटी से जुड़ा था। सोसाइटी ने मोहम्मद कमर की जगतपुर लाला बेगम गांव स्थित जमीन में हिस्सेदारी 10 नवंबर 1987 को पंजीकृत बिक्री विलेख के जरिए खरीदी थी। याचिकाकर्ता के अनुसार बिक्री से पहले अधिनियम की धारा 26 के तहत नोटिस भी दिए गए।
मोहम्मद कमर के खिलाफ चल रही भूमि सीमा कार्यवाही में वर्ष 1982 में 4,021.26 वर्ग मीटर जमीन को अतिरिक्त खाली जमीन घोषित किया गया। इसके बाद धारा 10(1) और धारा 10(3) के तहत अधिसूचनाएं क्रमशः 15 दिसंबर 1982 और 28 दिसंबर 1989 को जारी की गईं।
याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसे भूमि सीमा संबंधी कार्यवाही की जानकारी फरवरी 2024 में FIR दर्ज होने के बाद हुई। उसने 1999 के निरसन अधिनियम के आधार पर कार्यवाही खत्म करने की मांग की और कहा कि निरसन कानून लागू होने के समय वह जमीन पर कब्जे में था। याचिका में भूमि सीमा कार्यवाही में प्रक्रियागत खामियों का आरोप भी लगाया गया।
राज्य की ओर से इसका विरोध करते हुए कहा गया कि बिक्री 1976 के अधिनियम की धारा 10(4) के तहत शुरू से ही शून्य थी। राज्य ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता को जमीन खरीदते समय ही भूमि सीमा कार्यवाही की जानकारी थी, इसलिए इतने लंबे समय बाद याचिका दाखिल करना देरी से बाधित है।
हाईकोर्ट ने कहा कि अधिनियम की धारा 26 उन जमीनों पर लागू होती है, जो निर्धारित सीमा के भीतर आती हैं। बरेली में यह सीमा 1,500 वर्ग मीटर है। इसलिए कोर्ट ने 1,500 वर्ग मीटर जमीन तक की बिक्री को वैध माना।
हालांकि, 4,021.26 वर्ग मीटर अतिरिक्त घोषित जमीन के संबंध में कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के अपने ही पक्ष के अनुसार बिक्री धारा 10(1) की अधिसूचना जारी होने के बाद और धारा 10(3) की अधिसूचना से पहले हुई। इसलिए अतिरिक्त घोषित जमीन की बिक्री 1976 के अधिनियम की धारा 10(4) के तहत शून्य थी और 1999 के निरसन अधिनियम से उसे दोबारा वैध नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने समन्वय पीठ के रितेश तिवारी और एक अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले का हवाला दिया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा था। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ यूपी बनाम आदर्श सेवा सहकारी समिति लिमिटेड मामले का भी उल्लेख किया गया, जिसमें राज्य में निहित अतिरिक्त जमीन के हस्तांतरणकर्ता को कानून के अनुसार जमीन पर कब्जा लेने में राज्य की कथित विफलता को चुनौती देने का अधिकार नहीं माना गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब 10 नवंबर 1987 का बिक्री विलेख ही 4,021.26 वर्ग मीटर विवादित जमीन के संबंध में शून्य है तो याचिकाकर्ता का उस जमीन पर कोई अधिकार, स्वामित्व या हित नहीं है। ऐसे में उसे 1976 के अधिनियम के तहत भूमि सीमा कार्यवाही में कथित अनियमितताओं को चुनौती देने का अधिकार भी नहीं है।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता के यह कहने को भी खारिज किया कि उसे भूमि सीमा कार्यवाही की जानकारी नहीं थी। खंडपीठ ने कहा कि बिक्री विलेख में ही अधिनियम की धारा 26 के नोटिस का उल्लेख था। इससे स्पष्ट है कि जमीन खरीदते समय याचिकाकर्ता को भूमि सीमा कार्यवाही की जानकारी थी।
खंडपीठ ने याचिकाकर्ता के आचरण पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि उसने कोर्ट को गुमराह करने का प्रयास किया। ऐसे में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए उसे समानता के आधार पर राहत देने का यह उपयुक्त मामला नहीं है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अप्रैल 2024 में दाखिल की गई याचिका अत्यधिक देरी और लापरवाही से प्रभावित थी। इन सभी आधारों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज की।