इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अगर जिस आदेश के खिलाफ अपील की जा रही है, उसमें हर महीने किराया देने की ज़िम्मेदारी तय की गई है तो 'उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021' की धारा 35(1) के प्रावधान के तहत ज़रूरी 50% प्री-डिपॉज़िट (अपील से पहले जमा की जाने वाली रकम) अपील दाखिल करते समय जमा की गई रकम से पूरी नहीं हो जाती।

कोर्ट ने कहा कि अपील लंबित रहने के दौरान जो रकम देनी बनती है, उस पर भी यह शर्त लागू रहती है और अपीलीय अदालत उन्हें जमा करने का निर्देश दे सकती है।

धारा 35(1) के प्रावधान में कहा गया,

"जब तक अपील करने वाला किराया प्राधिकरण के आदेश के तहत देय पूरी रकम का 50% जमा नहीं कर देता, तब तक कोई अपील नहीं की जा सकती।"

जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने कहा,

"बाद वाली स्थिति में ज़िम्मेदारी को उस तारीख पर तय स्थिर रकम नहीं माना जा सकता, जिस दिन अपील दायर की गई। जिस आदेश को चुनौती दी गई, वह लागू रहता है और हर अगले समय-अवधि के बीतने के साथ उससे जुड़ी ज़िम्मेदारी भी बनती रहती है। इसलिए 'पूरी देय रकम' शब्द का अर्थ आदेश से बनी ज़िम्मेदारी की प्रकृति के संदर्भ में समझा जाना चाहिए। बार-बार होने वाली ज़िम्मेदारी के मामले में इसे अपील दायर करने की तारीख पर कृत्रिम रूप से स्थिर नहीं किया जा सकता।"

याचिकाकर्ता एक किरायेदार है। उसने एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज, कोर्ट नंबर 9 के 16.07.2026 के आदेश को मिसलेनियस सिविल अपील नंबर 98/2026 में चुनौती दी। अमीन से रिपोर्ट मांगने वाली किरायेदार की अर्ज़ी आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए अपीलीय अदालत ने उसे किराया प्राधिकरण के 30.01.2026 के आदेश (केस नंबर 328/2023) के तहत तय मासिक किराये का 50% जमा करने का निर्देश दिया - यही वह आदेश था जिसे अपील में चुनौती दी गई। यह दलील दी गई कि अपील दायर करते समय ही 'प्री-डिपॉज़िट' (पहले से जमा की जाने वाली राशि) जमा कर दी गई और अपील शुरू करने के लिए ज़रूरी शर्त पूरी हो गई।

प्रतिवादियों के वकील ने 'हेमंत कुमार गर्ग बनाम पुलकित गर्ग' मामले का हवाला देते हुए कहा कि जहां विवादित आदेश से बार-बार भुगतान की ज़िम्मेदारी (Recurring Liability) बनती है, वहाँ अपील शुरू करने पर ही ज़िम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती।

अदालत ने माना कि प्री-डिपॉज़िट की अनिवार्यता पर कोई विवाद नहीं है। अदालत ने कहा कि फ़ैसला इस बात पर करना था कि "कुल देय राशि" (Entire Payable Amount) की गणना किस समय तक की जानी चाहिए, जब ज़िम्मेदारी एक बार में पूरी होने के बजाय समय-समय पर बढ़ती रहती है। यह देखते हुए कि यह आदेश से बनने वाली ज़िम्मेदारी की प्रकृति पर निर्भर करता है, अदालत ने कहा कि इसके विपरीत अर्थ निकालने से अजीब नतीजा निकलेगा।

अदालत ने कहा,

"कोई किरायेदार अपील दायर करने की तारीख तक देय राशि का पचास प्रतिशत जमा कर सकता है। उसके बाद अपील की कार्यवाही के दौरान, विवादित आदेश के तहत हर महीने देय किराये का कानूनी हिस्सा भी जमा किए बिना परिसर में बना रह सकता है। इस तरह की व्याख्या असल में कानूनी ज़रूरत को उस आदेश के लगातार लागू होने से अलग कर देगी जिसके ख़िलाफ़ अपील लंबित है।"

'हेमंत कुमार गर्ग' मामले का पालन करते हुए, जिसमें विवादित आदेश ने संशोधित किराये के रूप में बार-बार भुगतान की ज़िम्मेदारी पैदा की, अदालत ने कहा कि इस वाक्यांश को "विवादित आदेश के तहत" शब्दों से अलग करके नहीं पढ़ा जा सकता। अदालत ने माना कि शुरुआती जमा और बाद की जमा राशियों के बीच का अंतर समय और ज़िम्मेदारी की प्रकृति का है, न कि दो अलग-अलग शर्तों का; और बार-बार देय किराये के पचास प्रतिशत तक सीमित निर्देश का मतलब विवादित आदेश का निष्पादन (Execution) नहीं है।

चूंकि 30.01.2026 के आदेश में परिसर के लिए मासिक देय किराया तय किया गया, इसलिए ज़िम्मेदारी बार-बार भुगतान वाली थी और शुरुआती जमा राशि को प्रावधान के तहत ज़रूरत को पूरा करने वाला नहीं माना जा सकता।

इस मामले को 'हेमंत कुमार गर्ग' मामले से अलग करने वाली कोई बात न मिलने और संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप की ज़रूरत वाली कोई अधिकार-क्षेत्र संबंधी गलती न मिलने पर अदालत ने याचिका खारिज की।

Case Title : Masers Rajasthan Motors v. State of U.P. and 2 others

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