पटना हाईकोर्ट ने कहा, बिहार को प्लास्टिक मुक्त करने के लिए कुछ साहसिक और प्रभावी कदम उठाने पड़ेंगे; राज्य से उसका विचार पूछा [आर्डर पढ़े]

Update: 2018-07-17 07:11 GMT
हम यह समझने में नाकाम हैं कि 50 माइक्रोंस से भी ऊपर के प्लास्टिक और पॉलिथीन की अनुमति क्यों दी जाए?

हाल ही में एक रिट याचिका पर स्वतः संज्ञान लेते हुए पटना हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य को प्लास्टिक मुक्त क्षेत्र सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार को कुछ साहसिक और प्रभावी निर्णय लेने होंगे।

दैनिक भास्कर के गया संस्करण में ऐतिहासिक ‘सरोवर’ को हो रहे प्रदूषण पर प्रकाशित खबर पर स्वतः संज्ञान लेते हुए एक याचिका पंजीकृत की गई  थी।

इस रिपोर्ट में यह कहा गया था कि श्रद्धालु महाबोधि मंदिर के बाहर से चारा खरीदते हैं और वे सरोवर की मछलियों को यह खिलाते हैं। पर ये चारे पॉलिथीन के थैलों में बंद होते हैं और अमूमन लोग पॉलिथीन में रखे चारे को ही सरोवर में फेंक देते हैं जिसकी वजह से तालाब के जीव जंतुओं पर निश्चित रूप से इसका असर पड़ता है साथ ही यह मंदिर की पूरी पारिस्थितिकी को प्रभावित करता है।

न्यायमूर्ति रवि रंजन और न्यायमूर्ति एस कुमार ने इस मुद्दे पर अपने फैसले में कहा, “जब हम इस तरह की खबरें पढ़ते हैं तो हमें रामधारी सिंह दिनकर का कविता संग्रह ‘सीपी और शंख” याद आता है जो झील की पुकार के बारे में हैं। हम अभी इस कविता को उद्धृत करने से नहीं रोक पा रहे हैं -

मत छुओ इस झील को।

कंकड़ी मारो नहीं,

पत्तियाँ डारो नहीं, फूल मत बोरो।

और कागज की तरी इसमें नहीं छोड़ो

खेल में तुमको पुलक-उन्मेष होता है,

 लहर बनने में सलिल को क्लेश होता है” 

जिला मजिस्ट्रेट-सह बोध गया मंदिर प्रबंधन समिति के अध्यक्ष ने कोर्ट से कहा कि मंदिर परिसर में सभी तरह के प्लास्टिक बैग्स को लाने पर पाबंदी लगाने और ऐसा करने वालों के लिए दंड लगाने का प्रावधान करने जैसे कदम उठाये जा रहे हैं।


...पॉलिथीन बैग्स और प्लास्टिक की बनी अन्य वस्तुओं से होने वाले नुकसान को देखते हुए क्यों न पूरे राज्य को इसकी परिधि में लाया जाए
?
 पूरे राज्य में ही प्लास्टिक की अनुमति क्यों दी जाए? यह जानते हुए भी कि प्लास्टिक का इतने पैमाने पर होने वाला उत्पादन और इसका प्रयोग अंततः कचरे में तब्दील हो जाता है जो कि नालों को मुंह बंद कर देता है, और यह पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है, इस बात को अच्छी तरह जानने के बाद बिहार अभी भी इसके प्रयोग की इजाजत दे रहा है,” कोर्ट ने कहा।

इसके बाद यह कहा गया कि सरकार ने कुछ आदेश जारी किये हैं जिसके तहत पटना में 50 माइक्रोन से कम मुटाई वाले प्लास्टिक बैग्स को प्रतिबंधित किया गया है।

पीठ ने आगे कहा, “अब प्रश्न यह है कि क्या इसको लागू किया जा रहा है?...क्या 50 माइक्रोन से कम मुटाई वाले प्लास्टिक का प्रयोग नहीं किया जा रहा है?”

राज्य के मुख्य सचिव को कोर्ट ने अपने निर्देश में कहा कि वह इस मुद्दे पर राज्य के विचारों से कोर्ट को अवगत कराएं। कोर्ट ने कहा, “...हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि  50 माइक्रोन से कम मुटाई वाले प्लास्टिक के भी प्रयोग की अनुमति क्यों होनी चाहिए? जिला मजिस्ट्रेट ने इस प्रश्न के उत्तर में यह बताया है कि इसे रीसायकल किया जा सकता है। इस तरह की स्थिति में, यह ज्यादा खराब है, क्योंकि यह हमें प्लास्टिक के उत्पादन और इसकी रीसाइक्लिंग के दुश्चक्र में फंसा देगा। हम यह भूल रहे हैं कि कितनी भारी मात्रा में कचरा तैयार हो रहा है जो कि सीवेज व्यवस्था को अवरुद्ध कर देगा और अंततः हमारे पर्यावरण को प्रभावित करेगा और फिर इस उत्पादन और रीसाइक्लिंग की वजह से  उत्पन्न होने वाले दमघोंटू गैसों का क्या होगा जो इस प्रकिया में निकलेंगे और वायुमंडल में मिलेंगे और हमारे वातावरण को लगातार प्रभावित करेंगे। उदाहरण के लिए ग्रीन हाउस गैसों का उत्पादन। हमारी इच्छा यह है कि बिहार को प्लास्टिक मुक्त क्षेत्र बनाने के लिए सरकार कुछ साहसिक और प्रभावी निर्णय ले।

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