विचाराधीन मामलों को “प्राथमिकता क्षेत्र का मुकदमा” माना जाए : जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट [आर्डर पढ़े]

Update: 2018-01-02 14:57 GMT

जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने इस बात पर जोर डाला है कि विचाराधीन कैदियों से जुड़े मामलों को प्राथमिकता क्षेत्र वाला मुकदमा माना जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति एमके हंजुरा ने एक ऐसे आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए यह बात कही जो कि पिछले आठ सालों से जेल में बंद है। आरोपी का कहना था कि अभी तक सुनवाई अदालत द्वारा जमा किए गए साक्ष्य में उसके खिलाफ कुछ भी ऐसा सामने नहीं आया है जिससे उस पर कोई अभियोग सिद्ध हो।

उसकी जमानत रद्द करते हुए कोर्ट ने सुनवाई अदालत को निर्देश दिया कि वह इस मामले में प्रक्रिया को बिना किसी और अनावश्यक देरी और स्थगन के हर दिन सुनवाई करके छह सप्ताह के भीतर पूरी करे।

कोर्ट ने कहा, “...विचाराधीन एवं अन्य कैदियों के मामलों को शीघ्रता से निपटाने के लिए जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने अब तक कई सर्कुलर जारी किए हैं। पर इनका बिना किसी डर के उल्लंघन किया जा रहा है। इस तरह की स्थिति देखकर तकलीफ़ होती है।”

हाई कोर्ट ने 2013 में सभी मुख्य और अतिरिक्त जिला जजों को निर्देश दिया था कि जिन विचाराधीन कैदियों के मामलों में चार्ज शीट/चालान 31 दिसंबर 2010 को या उससे पहले दाखिल किया जा चुका है उनके मामलों को 31 दिसंबर 2013 तक निपटा दिया जाए। कोर्ट ने कहा, “पर इस निर्देश को नहीं माना गया। यह इस बात को दर्शाता है कि स्थिति कितनी खराब और खेदजनक है।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि हाई कोर्ट को सर्कुलर के अनुसार प्रत्येक न्यायिक अधिकारी द्वारा किए गए कार्य के बारे में जानकारी रखनी होगी। कोर्ट ने कहा, “बिना किसी रोक, संतुलन और नियंत्रण के ये सर्कुलर सिर्फ कागजी ही बने रहेंगे। हाई कोर्ट को प्रत्येक न्यायिक अधिकारी के कार्य की निगरानी करनी होगी और सुनवाई जजों को यह बताने के लिए कहा जाएगा कि वे इस सर्कुलर को क्योंकि पूरी सक्षमता से लागू नहीं कर पाए। तेजी से सुनवाई आरोपियों को मिला मौलिक अधिकार है।”


 Full View

Similar News