विदेशी जहाज की गिरफ्तारी संभव अगर गिरफ्तारी और समुद्री दावे के बीच ना हो मालिकाना हक में बदलाव : सुप्रीम कोर्ट

Update: 2017-09-16 10:23 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि किसी विदेशी समुद्री जहाज को तभी गिरफ्तार किया जा सकता है जब गिरफ्तारी के वक्त और दावे के बीच मालिकाना हक में बदलाव ना हुआ हो।

जस्टिस रोहिंग्टन एफ नरीमन ने क्रिसोमार कॉरपोरेशन बनाम एमजेअार स्टील्स प्राइवेट लिमिटेड मामले में ये अहम फैसला सुनाया है क्योंकि इसमें समुद्री दावा कानून और भारतीय संविधा कानून के कई प्रावधानों पर भी गौर किया है।

पेश मामले में क्रिसोमार कॉरपोरेशन एमवी निकोलाओस नामक जहाज को डरबन पोर्ट पर बंकर व दूसरी जरूरी चीजें सप्लाई करता था। ये जहाज साइप्रस की थर्ड एलीमेंट इंटरप्राइजेज का था। जहाज मालिक ने सेवा के बदले में क्रिसोमार कंपनी के बिल नहीं चुकाए और जहाज बैंकाक के लिए समुद्री यात्रा पर निकल पडा। इस दौरान जहाज कोलकाता में रुका। इसी दौरान क्रिसोमार ने कलकत्ता हाईकोर्ट में सिविल दावा दाखिल कर दिया। हाईकोर्ट ने नौवाहन अधिकार का इस्तेमाल करते हुए सेवा के करार के तौर पर समुद्री दावे के तहत भुगतान का फैसला दिया।

6 जनवरी 2000 को कलकत्ता हाईकोर्ट मे दावे  के तौर पर जहाज तो जब्त करने के आदेश दे दिए। 25 जनवरी 2000 को अगली सुनवाई में वादी ने हाईकोर्ट को बताया कि उसने कोर्ट से बाहर 18 जनवरी 2000 को जहाज मालिक के साथ समझौता कर लिया है। करार के मुताबिक बैंकाक में कार्गो डिलीवरी से मिलने वाले फंड से वो क्रिसोमार का बिल चुकाएगा। इस करार को देखते हुए हाईकोर्ट ने अपने जब्ती आदेश वापस ले लिए। हालांकि जहाज बैंकाक के लिए रवाना ना होकर कलकत्ता में ही खडा रहा। इस दौरान एमजेआर स्टील्स ने कहा कि इसने इस जहाज को खरीद लिया है। हाईकोर्ट मे सिंगल जज बेंच ने डिक्री दे दी लेकिन डिवीजन बेंच ने इस आदेश को पलट दिया और दावे को खारिज कर दिया।

हाईकोर्ट ने फैसले में कहा कि किसी भी जहाज पर देनदारी तभी तय की जा सकती है जब समुद्री दावा सामुद्रिक गहन के तहत हो। जबकि जहाज में जरूरी सामान सप्लाई करने का दावा सामुद्रिक गहन के तौर पर नहीं आता। अगर सामुद्रिक गहन नहीं है तो जहाज के खिलाफ एेसी कार्रवाई नहीं हो सकती और सामान मिलने के वक्त ही जहाज मालिक के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। जहाज के बाद के मालिक पर ये देनदारी नहीं झोंकी जा सकती। हाईकोर्ट ने कहा कि 18 जनवरी 2000 को क्रिसोमार और थ्री एलीमेंट के बीच संविधा कानून के सेक्शन 62 के तहत नया करार हुआ इसलिए पुराने करार के आधार पर दावा नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने अस मामले में समुद्री नौवहन कानून, इसके उद्गम और कॉमन लॉ केसों के अलावा अंतरार्ष्ट्रीय संधियों पर गौर किया। साथ ही हाल ही में संसद द्वारा पास किए गए एडमिरल्टी (न्यायिक क्षेत्र एवं समुद्री दावा निपटान) कानून 2017 का भी अध्ययन किया।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि




  • समुद्री दावे और सामुद्रिक गहन में बडा अंतर होता है। सारे सामुद्रिक गहन समुद्री दावे होते हैं जबकि सारे समुद्री दावे सामुद्रिक गहन नहीं हो सकते। सामुद्रिक गहन जहाज के साथ ही चलता है चाहे वो जहां भी जाए। ये मालिक बदलने से प्रभावित नहीं होता। इसलिए सामुद्रिक गहन के ये दावे किए जा सकते हैं

  • जहाज द्वारा किया गया नुकसान

  •  जहाज कर्मियों का वेतन और भत्ते

  • पोत और जहाजी माल बंधपत्र

  • जहाज के मालिकाना हक को दावे के दौरान गिरफ्तारी के वक्त देखा जाना चाहिए ना कि दावे के शुरु होने के वक्त।

  • मालिकाना हक के बदलाव का करार नई संविदा नहीं है बल्कि ये पुराने करार में ही बदलाव है। इसमें देनदारी और देनदारी को लागू कराने संबंधी बदलाव होते हैं। इससे असली करार पर कोई फर्क नहीं पडता।

  • वादी अपना दावा जहाज पर कर सकता है मालिक के नाम से नहीं। एेसे मामलों में जहाज को एक व्यक्ति की तरह माना जाएगा और जहाज को गिरफ्तार किया जा सकता है। हालांकि जहाज के बचाव के लिए मालिक या अन्य कोई पेश हो सकते हैं। जहाज के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है अगर कार्रवाई के वक्त जहाज कोर्ट के अधिकारक्षेत्र में हो तो।


इन कानूनी मसलों का जवाब देते हुए सुप्रीम कोर ने जहाज के खिलाफ फैसला देते हुअ हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया। कोर्ट ने माना कि दावे के वक्त मालिकाना हक में बदलाव नहीं हुआ था।

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