'बिना सोच-समझ और Grounds of Detention दर्ज किए Preventive Detention Order पारित करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण', इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केंद्र से की सुधार की अपील
Praveen Mishra
6 Aug 2026 3:51 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने Preventive Detention आदेश पारित करने में अधिकारियों द्वारा बिना उचित विचार (Application of Mind) और Grounds of Detention दर्ज किए कार्रवाई करने की प्रवृत्ति को "बेहद दुर्भाग्यपूर्ण (Deplorable)" बताया है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए गंभीर चिंता का विषय है और केंद्र सरकार को इसे जल्द से जल्द दूर करना चाहिए।
जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने PIT NDPS Act, 1988 के तहत एक व्यक्ति की नजरबंदी (Preventive Detention) रद्द करते हुए उसकी तत्काल रिहाई का आदेश दिया।
कोर्ट ने पाया कि जब नजरबंदी का आदेश पारित किया गया, तब याचिकाकर्ता पहले से ही एक NDPS मामले में न्यायिक हिरासत में था। इसके बावजूद निरोधक प्राधिकारी (Detaining Authority) ने यह दर्ज नहीं किया कि उसके जल्द जमानत पर रिहा होने की वास्तविक संभावना क्या थी या फिर उसकी रिहाई के बाद Preventive Detention क्यों आवश्यक थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि Preventive Detention कोई दंडात्मक (Penal) व्यवस्था नहीं, बल्कि भविष्य में संभावित अवैध गतिविधियों को रोकने का असाधारण उपाय है। इसलिए "Reasons to Believe" ठोस और विश्वसनीय सामग्री पर आधारित होने चाहिए। अदालत ने यह भी पाया कि कथित घटना और नजरबंदी आदेश के बीच करीब 5.5 महीने की देरी हुई, जिससे दोनों के बीच का "Live Link" समाप्त हो गया।
कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार, Screening Committee और Advisory Board की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि उन्होंने स्वतंत्र संतुष्टि (Independent Subjective Satisfaction) दर्ज किए बिना केवल औपचारिक कार्रवाई की। साथ ही, PIT NDPS Act की धारा 3(2) का पालन न होने को भी आदेश रद्द करने का आधार माना।
इन सभी कारणों से हाईकोर्ट ने Preventive Detention Order को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता की तत्काल रिहाई का निर्देश दिया।


