उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 2018 के 'CM स्टिंग ऑपरेशन' मामले में नामजद व्यक्ति के खिलाफ FIR रद्द की, कहा- कोई दोषी ठहराने वाला सबूत नहीं मिला

  • उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 2018 के CM स्टिंग ऑपरेशन मामले में नामजद व्यक्ति के खिलाफ FIR रद्द की, कहा- कोई दोषी ठहराने वाला सबूत नहीं मिला

    उत्तराखंड हाईकोर्ट ने उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री को निशाना बनाने वाले कथित स्टिंग ऑपरेशन के सिलसिले में नामजद व्यक्ति के खिलाफ 2018 में दर्ज FIR रद्द की। कोर्ट ने कहा कि "याचिकाकर्ता को कथित अपराधों से जोड़ने वाली कोई शुरुआती सामग्री (prima facie material) न होने पर आपराधिक कार्यवाही की मुश्किलों और अनिश्चितता का सामना करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।"

    कोर्ट ने गौर किया कि FIR में केवल यह आरोप लगाया गया कि न्यूज़ चैनल के CEO ने शिकायतकर्ता को बताया कि याचिकाकर्ता तत्कालीन मुख्यमंत्री से अपॉइंटमेंट दिलाने में उसकी मदद कर सकता है, जबकि बाद में हुई जांच में उसके खिलाफ कोई दोषी ठहराने वाली सामग्री नहीं मिली।

    जस्टिस आलोक महरा ने याचिकाकर्ता द्वारा दायर रिट याचिका पर यह फैसला सुनाया, जिसमें IPC की धारा 386, 388 और 120-B के तहत दर्ज FIR को रद्द करने की मांग की गई।

    यह FIR 'समाचार प्लस' न्यूज़ चैनल के रिपोर्टर होने का दावा करने वाले व्यक्ति ने दर्ज कराई थी। FIR के अनुसार, चैनल के CEO ने उसे उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री पर स्टिंग ऑपरेशन करने का काम सौंपा था। याचिकाकर्ता उन लोगों में शामिल था जिनके बारे में CEO ने कथित तौर पर रिपोर्टर को बताया कि वह मुख्यमंत्री से अपॉइंटमेंट दिलाने में उसकी मदद कर सकते हैं।

    शिकायतकर्ता ने बताया कि वह तत्कालीन मुख्यमंत्री से मिला, लेकिन डर के कारण प्रस्तावित स्टिंग ऑपरेशन नहीं कर सका। इसके बाद उसने आरोप लगाया कि CEO और एक अन्य व्यक्ति ने धमकी दी कि अगर वह स्टिंग ऑपरेशन सफल नहीं कर पाया तो उसका करियर बर्बाद हो जाएगा और उसे मार दिया जाएगा।

    जांच के बाद 25 मार्च 2019 को चैनल के CEO के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। जांच के दौरान दस जांच अधिकारी बदले गए। हालांकि, याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई चार्जशीट दाखिल नहीं की गई।

    याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि FIR में उस पर कोई खास काम या भूमिका नहीं बताई गई। इसलिए यह तर्क दिया गया कि कार्यवाही जारी रखने की अनुमति देना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और इससे बेवजह परेशानी होगी।

    रॉबर्ट लालचुंगनुंगा चोंगथु उर्फ़ आर.एल. चोंगथु बनाम बिहार राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले का भी हवाला दिया गया, जिसमें लंबी जांच और आर्टिकल 21 के तहत तेज़ी से सुनवाई के मौलिक अधिकार की बात कही गई।

    राज्य ने बताया कि 25 मार्च, 2019 को CEO और एक अन्य व्यक्ति के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर की गई। हालांकि, निर्देशों और अपने काउंटर-एफ़िडेविट में दी गई जानकारी के आधार पर राज्य ने निष्पक्ष रूप से माना कि याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ कोई भी दोषी ठहराने वाला सबूत नहीं मिला और उसके ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर नहीं की गई।

    बेंच ने खास तौर पर कहा,

    "सिर्फ़ यह कहना कि CEO ने शिकायतकर्ता को बताया कि याचिकाकर्ता तत्कालीन मुख्यमंत्री से अपॉइंटमेंट दिलाने में उसकी मदद करेगा - और इसके अलावा धमकी देने, जबरन वसूली करने, शिकायतकर्ता को चोट पहुँचाने का डर दिखाने या कथित आपराधिक साज़िश में शामिल होने का कोई आरोप न होने पर - अकेले ही याचिकाकर्ता पर लगाए गए अपराधों को साबित नहीं करता है।"

    कोर्ट ने इस बात पर खास ज़ोर दिया कि जांच पहले ही पूरी हो चुकी है और दो अन्य आरोपियों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर की जा चुकी है, "जबकि जांच एजेंसी ने जांच के दौरान दस जांच अधिकारी बदले, फिर भी उसने माना है कि याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ कोई भी दोषी ठहराने वाला सबूत नहीं मिला।"

    इसलिए कोर्ट ने माना,

    "इस कोर्ट के सामने ऐसा कोई सबूत नहीं है, जो पहली नज़र में याचिकाकर्ता को FIR में बताए गए अपराधों से जोड़ता हो।"

    इसके अनुसार, कोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार की और याचिकाकर्ता के खिलाफ FIR तथा उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियों को रद्द किया।

    Case: Mritunjay Kumar Mishra Versus State Of Uttarakhand [WPCRL/2092/2018]

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