उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भर्ती परीक्षा में नकल के मामले में कथित 'आउटसाइड सॉल्वर' को ज़मानत देने से किया इनकार
Shahadat
24 April 2026 10:34 AM IST

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने आरोपी को ज़मानत देने से इनकार किया, जिस पर आरोप है कि उसने एक चल रही परीक्षा में नकल की साज़िश के तहत "आउटसाइड सॉल्वर" (बाहर से सवाल हल करने वाले) के तौर पर काम किया था। कोर्ट ने कहा कि डिजिटल सबूत, जिनसे पता चलता है कि परीक्षा के दौरान ही प्रश्न पत्रों को रियल-टाइम में भेजा और हल किया गया, अपने आप में एक मज़बूत प्रथम दृष्टया (prima facie) सबूत हैं।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि इस तरह के अपराध सार्वजनिक भर्ती परीक्षाओं की शुचिता पर सीधा हमला करते हैं और चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर जनता के भरोसे को कमज़ोर करते हैं। इसलिए ज़मानत के चरण में इन्हें कोई मामूली या हानिरहित काम नहीं माना जा सकता।
जस्टिस आशीष नैथानी एक महिला आरोपी द्वारा दायर पहली ज़मानत याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। यह मामला CBI द्वारा जाँचा जा रहा है और इसका संबंध 21.09.2025 को उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग द्वारा आयोजित स्नातक-स्तरीय भर्ती परीक्षा में कथित तौर पर अनुचित साधनों के इस्तेमाल से है।
इस मामले की शुरुआती जांच SIT ने की थी और बाद में इसे CBI को सौंप दिया गया था।
अभियोजन पक्ष का कहना है कि याचिकाकर्ता ने "आउटसाइड सॉल्वर" के तौर पर काम किया। उसने परीक्षा केंद्र के अंदर से सह-आरोपी के ज़रिए सवालों की तस्वीरें हासिल कीं और परीक्षा के दौरान ही उनके जवाब वापस भेज दिए। रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से पता चलता है कि 11:35 AM के आसपास बारह सवालों वाली तीन तस्वीरें भेजी गई थीं और कुछ ही मिनटों के भीतर उनके जवाब वापस भेज दिए गए।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि उसे झूठा फंसाया गया। उसे इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि ये सवाल किसी चल रही परीक्षा से जुड़े हैं या वहां कोई नक़ली परीक्षार्थी (Impersonation) बैठा है। उसने कहा कि उसने तो बस उसे भेजे गए सवालों को यह मानते हुए हल किया कि वे सामान्य सवाल हैं, और उसे किसी बड़ी धोखाधड़ी की साज़िश के बारे में कोई जानकारी नहीं है।
आगे यह भी तर्क दिया गया कि उसे इस काम से कोई आर्थिक लाभ नहीं हुआ, उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। साथ ही जांच के दौरान उसे पहले एक गवाह के तौर पर ही माना गया। याचिकाकर्ता ने उन अन्य आरोपियों के साथ समानता (Parity) का भी हवाला दिया, जिन्हें अलग-अलग सुनवाई में ज़मानत मिल चुकी है।
हालांकि, ज़मानत याचिका का विरोध करते हुए CBI ने इलेक्ट्रॉनिक सबूतों का हवाला दिया—जिनमें WhatsApp चैट और IPDR डेटा शामिल हैं—और यह तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने जान-बूझकर चल रही परीक्षा के सवालों को हल करने में हिस्सा लिया था।
इसलिए यह मानते हुए कि इस स्टेज पर बेल का कोई मामला नहीं बनता, हाईकोर्ट ने जमानत अर्जी खारिज की।
Case Name: Smt. Suman v Central Bureau of Investigation

