जब शादी का रिश्ता काफ़ी हद तक टूट चुका हो तो उसे सिर्फ़ कानूनी तौर पर बचाए रखने से शादी की पवित्रता बनी नहीं रहती: उड़ीसा हाईकोर्ट
Shahadat
5 Oct 2026 7:36 PM IST

उड़ीसा हाईकोर्ट ने कहा कि जब पति-पत्नी के बीच वैवाहिक रिश्ता काफ़ी हद तक टूट चुका हो तो शादी को सिर्फ़ कानूनी रूप से बचाए रखना बेमतलब है और इससे शादी की पवित्रता भी बनी नहीं रहती। [2026 LiveLaw (Ori) 115]
एक जोड़े को तलाक देने के फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए चीफ जस्टिस हरीश टंडन और जस्टिस चित्तरंजन डैश की डिवीजन बेंच ने टिप्पणी की,
“निस्संदेह शादी की एक पवित्रता होती है, जिसे कोर्ट को आम तौर पर बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए। लेकिन जब रिश्ते की मुख्य नींव ही काफ़ी हद तक टूट चुकी हो, तो सिर्फ़ रिश्ते के कानूनी रूप को बनाए रखने से शादी की पवित्रता बनी नहीं रहती। आपसी सम्मान, भरोसा, साथ और उचित तालमेल बिठाने की इच्छा वैवाहिक जीवन की मामूली बातें नहीं हैं; ये इसकी असल नींव हैं।”
अपील करने वाले पति और प्रतिवादी पत्नी हैं। दोनों IT प्रोफेशनल हैं। उन्होंने अक्टूबर 2021 में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार शादी की थी। विशाखापत्तनम और हैदराबाद में एक साल से ज़्यादा समय तक साथ रहने के बाद पत्नी ने कथित तौर पर वैवाहिक घर छोड़ दिया और रायगढ़ा के फैमिली कोर्ट में तलाक के लिए अर्जी दाखिल की।
फैमिली कोर्ट ने सबूतों की अच्छी तरह से जांच-पड़ताल करने के बाद अपील करने वाले पति द्वारा प्रतिवादी पत्नी के साथ क्रूरता किए जाने के आधार पर दोनों के बीच शादी को खत्म करना सही समझा। इस आदेश के खिलाफ़, अपील करने वाले ने यह वैवाहिक अपील दायर की।
अपील करने वाले का तर्क था कि फैमिली कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकालने में गलती की कि पत्नी के साथ क्रूरता की गई। कोर्ट को यह भी बताया गया कि पत्नी द्वारा घर छोड़ने के बाद पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए अर्जी दाखिल की।
कोर्ट ने पत्नी की दलीलों पर ध्यान दिया, जिसमें आरोप लगाया गया कि पति द्वारा रात के समय बार-बार मारपीट की जाती थी, कभी-कभी दरवाज़ा खोलने के लिए खटखटाने के बावजूद उसे कमरे के अंदर बंद कर दिया जाता था, और उससे पैसे की मांग की जाती थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि शादी की सालगिरह के मौके पर अपील करने वाले व्यक्ति (पति) ने सबके सामने उन्हें थप्पड़ मारा था।
कोर्ट के ध्यान में यह भी आया कि जब पत्नी के पिता अपील करने वाले के घर गए तो उन्हें अपमानित किया गया और उनके साथ मारपीट की गई। इसके अलावा, यह आरोप लगाया गया कि बाद में रिश्तेदारों को बुलाया गया और प्रतिवादी (पत्नी) और उनके पिता से घर छोड़ने के लिए कहा गया; आरोप यह था कि अपील करने वाले के परिवार की उम्मीदें पूरी नहीं हुई थीं। इन हालात की वजह से उन्हें असुरक्षित महसूस हुआ और उन्हें रायगढ़ जाना पड़ा।
जस्टिस डैश ने 'श्री राकेश रमन बनाम श्रीमती कविता, 2023 LiveLaw (SC) 353' मामले का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक मामलों में क्रूरता की किसी एक घटना को बताना हमेशा संभव नहीं होता है। कोर्ट को पूरे वैवाहिक रिश्ते की जांच करनी चाहिए। अगर शादी पूरी तरह से टूट चुकी हो तो उसे 'क्रूरता' के आधार पर खत्म किया जा सकता है।
इसी के अनुसार, कोर्ट ने कहा,
“सभी बातों का एक साथ आकलन करना इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रतिवादी-पत्नी ने किसी मामूली अनबन के कारण वैवाहिक घर नहीं छोड़ा था। उनके बयान के अनुसार, उन्होंने हैदराबाद की घटनाओं के बाद ऐसे हालात में घर छोड़ा जब उन्हें असुरक्षित और अपमानित महसूस हुआ। बाद में उनके परिवार ने सुलह की जो कोशिशें कीं, उनसे रिश्ता ठीक नहीं हो पाया। इसलिए दोनों पक्षों के सबूतों से न केवल पति-पत्नी की सोच में अंतर का पता चलता है, बल्कि एक ऐसे रिश्ते का भी पता चलता है जिसमें आपसी भरोसे का मुख्य तत्व काफी हद तक खत्म हो चुका है।”
बेंच ने पति के समर्थन में आए गवाहों के बयानों पर भी गौर किया। इन बयानों से इस बात की पुष्टि हुई कि पत्नी के घर छोड़ने से पहले वैवाहिक जीवन में गंभीर विवाद हुआ, जिसके लिए रिश्तेदारों की बैठक बुलानी पड़ी थी। इसके अलावा, पति-पत्नी के बीच भेजे गए संदेशों से भी उनके खराब रिश्तों का पता चलता है। अहम बात यह है कि कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होने पर पति-पत्नी दोनों ने अलग होने की इच्छा जताई।
इसलिए सभी बातों पर विचार करने के बाद कोर्ट ने यह राय दी,
“हमारा मानना है कि फैमिली कोर्ट का यह निष्कर्ष सही था कि प्रतिवादी-पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता साबित की थी। यह निष्कर्ष केवल अलग होने या बाद में रिश्ते के टूटने पर आधारित नहीं है, बल्कि सबूतों से साबित हुए व्यवहार और उन हालात पर आधारित है जिनमें वैवाहिक रिश्ता खराब हुआ।”
नतीजतन, तलाक का फैसला और डिक्री बरकरार रखी गई।
Case Title : SSSK v. SSAP

