करीब 15 साल की सेवा के बाद संविदा कर्मचारी को नियमित करने का निर्देश, त्रिपुरा हाईकोर्ट ने यूनिवर्सिटी को लगाई फटकार
Praveen Mishra
24 Oct 2026 7:25 PM IST

त्रिपुरा हाईकोर्ट ने त्रिपुरा यूनिवर्सिटी को एक संविदा कर्मचारी को असिस्टेंट प्लेसमेंट ऑफिसर के पद पर तत्काल बहाल करने और नियमित करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी की शुरुआती नियुक्ति संविदा पर होने मात्र से उसकी लगभग 15 साल की सेवा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
चीफ जस्टिस एमएस रामचंद्र राव और जस्टिस बिस्वजीत पालित की खंडपीठ ने कहा कि अदालतों को रोजगार के केवल औपचारिक स्वरूप के बजाय उसकी वास्तविक परिस्थितियों पर भी विचार करना चाहिए। कोर्ट ने माना कि कर्मचारी को नियमित करने से इनकार करना और रिट याचिका खारिज होने के बाद उसकी सेवाएं समाप्त करना स्पष्ट अन्याय था।
क्या था मामला?
अपीलकर्ता जयन्ती भट्टाचार्जी ने 4 फरवरी, 2009 को सार्वजनिक विज्ञापन और चयन प्रक्रिया के तहत त्रिपुरा यूनिवर्सिटी के बीबीए कार्यक्रम में संविदा लेक्चरर के रूप में काम शुरू किया था। 2 फरवरी, 2016 को उन्हें असिस्टेंट प्लेसमेंट ऑफिसर के पद पर पुनर्नियुक्त/पदनामित किया गया।
सितंबर 2022 में यूनिवर्सिटी ने एक आदेश जारी कर जनवरी 2022 से उनका पारिश्रमिक ₹1,200 प्रतिदिन निर्धारित कर दिया। उन्होंने इस आदेश को चुनौती देते हुए सेवा नियमित करने की मांग की, लेकिन एकल न्यायाधीश ने 9 जनवरी, 2024 को उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने खंडपीठ के समक्ष अपील दायर की।
यूनिवर्सिटी अपनी ही विफलता का लाभ नहीं उठा सकती: कोर्ट
हाईकोर्ट ने यूनिवर्सिटी की इस दलील को स्वीकार नहीं किया कि उनकी शुरुआती नियुक्ति किसी स्वीकृत नियमित पद पर नहीं हुई थी। कोर्ट ने कहा कि बीबीए कार्यक्रम को संविदा शिक्षकों के माध्यम से संचालित करते हुए नियमित पद सृजित न करने की अपनी विफलता का लाभ यूनिवर्सिटी कर्मचारी के खिलाफ नहीं उठा सकती।
कोर्ट ने यह भी पाया कि यूनिवर्सिटी यह साबित नहीं कर सकी कि 2008 में चयन के समय जयन्ती निर्धारित योग्यताएं पूरी नहीं करती थीं। बाद में लागू हुई UGC की योग्यताओं को पूर्वव्यापी रूप से लागू करके उनकी शुरुआती नियुक्ति को अमान्य नहीं ठहराया जा सकता।
खंडपीठ ने कहा कि लगभग 15 वर्षों तक कर्मचारी के साथ अनुचित और मनमाना व्यवहार किया गया। कोर्ट ने संविदा नियुक्तियों के व्यापक दुरुपयोग को कर्मचारियों के अधिकारों और नौकरी की सुरक्षा को प्रभावित करने वाली व्यवस्था संबंधी समस्या भी बताया।
नियमित पदनाम में बदलाव को मनमाना और अवैध माना
हाईकोर्ट ने 2016 में उनके पदनाम में किए गए बदलाव को भी मनमाना और अवैध पाया। कोर्ट ने 30 सितंबर, 2022 के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि यूनिवर्सिटी ने उन्हें दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी के रूप में वर्गीकृत करने से पहले न तो पूर्व सूचना दी और न ही सुनवाई का अवसर प्रदान किया। इसे संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन माना गया।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि Secretary, State of Karnataka v. Umadevi का फैसला इस मामले में लागू नहीं होता, क्योंकि जयन्ती की नियुक्ति सार्वजनिक विज्ञापन और चयन समिति द्वारा आयोजित साक्षात्कार के माध्यम से हुई थी। इसलिए उनकी नियुक्ति को पिछले दरवाजे से की गई नियुक्ति नहीं कहा जा सकता।
लेक्चरर के पद पर नियमित करने से इनकार
हालांकि, हाईकोर्ट ने उन्हें लेक्चरर के पद पर नियमित करने से इनकार कर दिया, क्योंकि उन्होंने दस साल से अधिक समय से शिक्षण कार्य नहीं किया था। इसके बजाय कोर्ट ने यूनिवर्सिटी को निर्देश दिया कि उन्हें बिजनेस मैनेजमेंट विभाग में असिस्टेंट प्लेसमेंट ऑफिसर के रूप में तत्काल बहाल किया जाए और फैसले के एक महीने के भीतर इस पद पर नियमित किया जाए।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि नियमित वेतनमान और पद से जुड़े भत्ते दिए जाएं। साथ ही, 4 फरवरी, 2009 से उनकी सेवा को पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों के लिए अर्हक सेवा के रूप में गिना जाए। यूनिवर्सिटी को चार सप्ताह के भीतर ₹25,000 मुकदमा खर्च के रूप में भुगतान करने का भी निर्देश दिया गया।

