महिला जेलर को प्रमोशन देने से इनकार करने का कोई कानूनी आधार नहीं, क्योंकि भर्ती नियमों में जेंडर के आधार पर कोई भेदभाव नहीं: त्रिपुरा हाईकोर्ट
Shahadat
26 July 2026 12:21 AM IST

त्रिपुरा हाईकोर्ट ने कहा कि भर्ती नियमों में जेंडर-आधारित प्रतिबंधों का कोई प्रावधान न होने के कारण किसी महिला जेलर को केवल उसके जेंडर के आधार पर डिप्टी सुपरिटेंडेंट (होम) जेल के पद पर प्रमोशन के लिए विचार करने से वंचित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने पाया कि लागू भर्ती नियमों में प्रमोशन के लिए पुरुष और महिला जेलरों के बीच कोई अंतर नहीं किया गया। इसलिए कोर्ट ने फैसला सुनाया कि जेंडर भेदभाव के आधार पर याचिकाकर्ता को प्रमोशन से वंचित करने का "कोई कानूनी आधार" नहीं है।
जस्टिस बिस्वजीत पालित ने टिप्पणी की:
"याचिकाकर्ता द्वारा जिन भर्ती नियमों का हवाला दिया गया, उनसे ऐसा लगता है कि डिप्टी सुपरिटेंडेंट के पद पर किसी महिला जेलर के प्रमोशन के संबंध में उन नियमों में जेंडर के आधार पर कोई भेदभाव नहीं है। इसलिए किसी विशिष्ट नियम के अभाव में जेंडर भेदभाव के आधार पर याचिकाकर्ता को डिप्टी सुपरिटेंडेंट (होम) जेल के पद पर प्रमोशन से वंचित करने का कोई कानूनी आधार नहीं है।"
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता 1997 में त्रिपुरा पब्लिक सर्विस कमीशन के माध्यम से त्रिपुरा जेल विभाग में महिला सब-जेलर के तौर पर शामिल हुई थीं। हालांकि दस साल की सेवा पूरी करने के बाद वह महिला जेलर के पद पर प्रमोशन के लिए योग्य हो गईं, लेकिन हाईकोर्ट द्वारा एक पिछली रिट याचिका में दिए गए निर्देशों के बाद उन्हें 2018 में ही प्रमोट किया गया।
पांच साल तक जेलर के तौर पर काम करने के बाद उन्होंने लागू भर्ती नियमों के तहत डिप्टी सुपरिटेंडेंट के पद पर प्रमोशन के लिए अपनी पात्रता का दावा किया। जब अधिकारियों ने उनके दावे पर विचार नहीं किया तो उन्होंने एक और रिट याचिका के साथ हाईकोर्ट का रुख किया, जिसमें कोर्ट ने अधिकारियों को उनके मामले पर विचार करने का निर्देश दिया। हालांकि, विचार करने के बजाय जेल महानिरीक्षक (Inspector General of Prisons) ने 1 मई, 2025 को एक सूचना जारी कर घोषणा की कि वह प्रमोशन के लिए योग्य नहीं हैं।
इससे व्यथित होकर याचिकाकर्ता ने यह रिट याचिका दायर की और तर्क दिया कि प्रमोशन से इनकार केवल उनके जेंडर के आधार पर किया गया, जबकि भर्ती नियमों के तहत ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं था। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता का सर्विस रिकॉर्ड बेदाग था और 2018 में प्रमोशन के बाद से वह जेलर के तौर पर अपनी ड्यूटी संतोषजनक ढंग से निभा रही थीं।
यह दोहराते हुए कि प्रमोशन पर पूर्ण अधिकार का दावा नहीं किया जा सकता, कोर्ट ने कहा कि एक योग्य कर्मचारी मेरिट और सर्विस रिकॉर्ड के आधार पर प्रमोशन के लिए निष्पक्ष विचार का हकदार है। प्रतिवादियों ने याचिकाकर्ता के खिलाफ ऐसा कोई प्रतिकूल तथ्य पेश नहीं किया था जो इस तरह के विचार से इनकार को सही ठहरा सके।
कोर्ट ने आगे कहा कि लागू भर्ती नियमों में डिप्टी सुपरिटेंडेंट के पद पर प्रमोशन के लिए पुरुष और महिला जेलरों के बीच कोई अंतर नहीं किया गया। इसलिए ऐसी पाबंदी तय करने वाले किसी कानूनी प्रावधान के अभाव में अधिकारी केवल याचिकाकर्ता के लिंग के आधार पर उसे प्रमोशन देने से इनकार नहीं कर सकते थे।
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि राज्य याचिकाकर्ता का दावा खारिज करने वाले कम्युनिकेशन को सही ठहराने में विफल रहा और उसके मामले पर विचार करने के निर्देश वाले पहले के आदेश का पालन नहीं किया। इसलिए कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि विवादित कम्युनिकेशन भर्ती नियमों के खिलाफ था और उसे बरकरार नहीं रखा जा सकता।
Case Name: Smti.Bela Dutta v. The State of Tripura


