UAPA | सिर्फ विदेशी नागरिक होने के आधार पर जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता, भारत में अवैध प्रवेश साबित करना जरूरी: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
27 Oct 2026 9:35 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (27 अक्टूबर) को कहा कि 'गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम' (UAPA) के तहत किसी विदेशी नागरिक को जमानत देने पर कोई रोक नहीं है।
भारत सरकार की अपील खारिज करते हुए जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें श्रीलंका का नागरिक होने के आरोपी एक व्यक्ति को जमानत दी गई थी।
कोर्ट ने कहा कि धारा 43D (7) के तहत किसी विदेशी नागरिक को जमानत देने के लिए कड़े नियम होने के बावजूद, अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि आरोपी का भारत में शुरुआती प्रवेश अवैध था।
धारा 43D (7) के अनुसार, किसी विदेशी नागरिक को जमानत देने से रोकने के लिए अभियोजन पक्ष को निम्नलिखित बातें साबित करनी होंगी:
पहली, वह व्यक्ति UAPA के तहत दंडनीय किसी अपराध का आरोपी होना चाहिए।
दूसरी, वह व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं होना चाहिए।
तीसरी, उसने भारत में बिना अनुमति या अवैध तरीके से प्रवेश किया हो।
कोर्ट ने कहा कि दूसरी और तीसरी शर्तें एक-दूसरे से जुड़ी हुईं और इन्हें एक साथ पढ़ा जाना चाहिए, क्योंकि इनके बीच 'और' (and) शब्द का इस्तेमाल किया गया है। इसका मतलब है कि किसी विदेशी नागरिक को जमानत देने से इनकार करने के लिए दोनों शर्तों का पूरा होना अनिवार्य है। यानी, किसी आरोपी के सिर्फ विदेशी नागरिक होने को साबित कर देना ही उसे जमानत देने से इनकार करने के लिए काफी नहीं है; बल्कि यह भी साबित करना होगा कि उस विदेशी आरोपी का भारत में शुरुआती प्रवेश अवैध या बिना अनुमति के था, तभी जमानत से इनकार करने का यह प्रावधान लागू हो सकता है।
कोर्ट ने कहा,
“…केवल इसलिए कि कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं है, धारा 43D की उप-धारा (7) के कठोर प्रावधान लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए यह शर्त भी पूरी होनी चाहिए कि 'भारत में प्रवेश करते समय' उसका प्रवेश अनधिकृत या अवैध रहा हो। इसलिए, यहाँ यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यदि कोई विदेशी नागरिक किसी अनुमति या कानूनी प्रक्रिया (जैसे वैध वीज़ा) के तहत भारत में प्रवेश करता है तो बाद में उस अनुमति के रद्द हो जाने या उसके प्रवास के अवैध हो जाने से उसका वैध प्रवेश अपने आप 'अनधिकृत या अवैध प्रवेश' में नहीं बदल जाएगा। धारा 43D की उप-धारा (7) लागू करने के लिए यह आवश्यक है कि उस व्यक्ति का भारत में शुरुआती प्रवेश ही अनधिकृत या अवैध रहा हो। जब तक ये शर्तें पूरी नहीं होतीं, तब तक धारा 43D(7) के तहत कानूनी रोक लागू नहीं की जा सकती।”
यह मामला मद्रास हाईकोर्ट द्वारा प्रतिवादी को जमानत दिए जाने से जुड़ा है। कोर्ट ने गौर किया कि आरोपी के श्रीलंकाई नागरिक होने को साबित करने के लिए केंद्र सरकार के पास खुफिया रिपोर्ट के अलावा कोई अन्य सबूत नहीं है। साथ ही हाईकोर्ट के पास यह विवेकाधिकार है कि वह UAPA की धारा 43D(7) के तहत, भारतीय नागरिक न होने वाले व्यक्ति को भी जमानत दे सकता है।
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि रिफास श्रीलंकाई नागरिक है, जो 2009 में भारत आया था और अपने वीज़ा की अवधि समाप्त होने के बाद भी यहाँ रुक गया। आरोप यह भी है कि उसने वोटर आईडी कार्ड, आधार कार्ड और राशन कार्ड जैसे भारतीय पहचान दस्तावेज हासिल कर लिए थे।
जुलाई, 2018 में जब जांच एजेंसी तय समय-सीमा के भीतर चार्जशीट दाखिल करने में विफल रही, तो सेशन कोर्ट ने उसे 'डिफ़ॉल्ट ज़मानत' (Default Bail) दी थी। बाद में केंद्र सरकार ने यह तर्क देते हुए जमानत रद्द करने की मांग की कि आरोपी ने अपनी श्रीलंकाई नागरिकता छिपाई थी।
जुलाई, 2022 में विशेष अदालत ने UAPA की धारा 43D(7) के तहत उसकी जमानत रद्द की। हालांकि, दिसंबर 2023 में मद्रास हाई कोर्ट ने उस आदेश को पलट दिया, जिसके बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
परिणामस्वरूप, अपील में कोई दम न होने के कारण उसे खारिज कर दिया गया।
Case Title : UNION OF INDIA VERSUS MOHAMED RIFAS @ MOHAMED RIGBAS

