सुप्रीम कोर्ट में उठा सवाल: क्या रिट याचिकाओं को 'सिविल' और 'क्रिमिनल' में बांटना जरूरी है?

Praveen Mishra

11 Sept 2026 1:43 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट में उठा सवाल: क्या रिट याचिकाओं को सिविल और क्रिमिनल में बांटना जरूरी है?

    सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को रिट याचिकाओं को 'सिविल' और 'क्रिमिनल' के रूप में वर्गीकृत करने को लेकर अहम चर्चा हुई। सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि आदर्श रूप से सभी मामलों को सिर्फ 'रिट पिटीशन' के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मामले की प्रकृति का असर इंट्रा-कोर्ट अपील की सुनवाई योग्य होने (maintainability) पर पड़ सकता है।

    यह चर्चा Directorate of Enforcement v. Meghraj Singh मामले की सुनवाई के दौरान हुई। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने राजस्थान हाईकोर्ट के एक हालिया आदेश का हवाला देते हुए कहा कि वहां मामलों को 'क्रिमिनल रिट पिटीशन' के रूप में दर्ज करने की प्रथा पर रोक लगाई गई है।

    राजस्थान हाईकोर्ट ने क्या कहा था?

    राजस्थान हाईकोर्ट ने Jiya & Ors v. Government of Rajasthan मामले में अपनी रजिस्ट्री को मामलों को 'क्रिमिनल रिट पिटीशन' के रूप में दर्ज नहीं करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि संविधान के तहत 'क्रिमिनल रिट पिटीशन' नाम की कोई अलग श्रेणी नहीं है।

    सॉलिसिटर जनरल मेहता ने इस आदेश पर आपत्ति जताते हुए कहा कि यह सुप्रीम कोर्ट के Ram Kishan Fauji v. State of Haryana (2017) फैसले के विपरीत है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट के नियमों में सिविल और क्रिमिनल रिट याचिकाओं का वर्गीकरण किया गया है और वह इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे।

    जस्टिस दत्ता ने कहा- 'मैं इस बात से आंशिक रूप से सहमत हूं'

    जस्टिस दीपांकर दत्ता ने राजस्थान हाईकोर्ट के दृष्टिकोण से आंशिक सहमति और आंशिक असहमति जताई।

    उन्होंने कहा कि सिद्धांत रूप में सभी रिट याचिकाओं को 'रिट पिटीशन' के रूप में ही वर्गीकृत किया जाना चाहिए, चाहे उनका विषय सिविल हो या क्रिमिनल। लेकिन यदि याचिका का विषय आपराधिक कार्यवाही से जुड़ा है, तो Ram Kishan Fauji का सिद्धांत लागू हो सकता है।

    साथ ही जस्टिस दत्ता ने सवाल उठाया कि यदि राजस्थान हाईकोर्ट के अपने नियम सिविल और क्रिमिनल रिट का वर्गीकरण करते हैं, तो किसी डिवीजन बेंच को बिना उन नियमों को चुनौती दिए रजिस्ट्री को उनका पालन न करने का निर्देश देने का अधिकार कैसे हो सकता है।

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने नियमों पर भी टिप्पणी की

    जस्टिस दत्ता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट खुद कई बार अपने नियमों से अलग तरीके से काम करता है और इसका असर हाईकोर्ट पर भी पड़ सकता है।

    उन्होंने टिप्पणी की कि संवैधानिक अदालतें कानून से ऊपर नहीं हैं और उन्हें अपने बनाए नियमों का पालन करना चाहिए।

    क्या है Ram Kishan Fauji मामला?

    Ram Kishan Fauji v. State of Haryana (2017) में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने यह सवाल तय किया था कि आपराधिक कार्यवाही से जुड़े मामले में Article 226 के तहत Single Judge द्वारा दिए गए आदेश के खिलाफ Letters Patent Appeal (LPA) दायर की जा सकती है या नहीं।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि Single Judge ने Article 226 के तहत अधिकार का इस्तेमाल किया या Section 482 CrPC के तहत। यह देखना जरूरी है कि मामले की वास्तविक प्रकृति और मांगी गई राहत क्या है।

    कोर्ट ने माना था कि यदि मामला मूल रूप से आपराधिक क्षेत्राधिकार से जुड़ा है, तो केवल Article 226 का इस्तेमाल करने से वह सिविल कार्यवाही नहीं बन जाती। ऐसे मामलों में आपराधिक क्षेत्राधिकार से जुड़े इंट्रा-कोर्ट अपील पर लागू प्रतिबंध प्रभावी हो सकते हैं।

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    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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