सबरीमाला संदर्भ के मद्देनज़र सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक धार्मिक संस्थान कानून पर फैसला सुरक्षित रखने का आदेश लिया वापस
Praveen Mishra
28 April 2026 12:18 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला संदर्भ में लंबित संवैधानिक सवालों को देखते हुए कर्नाटक हिंदू धार्मिक संस्थान और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1997 की वैधता पर अपना पहले सुरक्षित रखा गया फैसला वापस ले लिया है। अदालत ने कहा कि इस मामले का सीधा संबंध 9-जजों की संविधान पीठ के समक्ष लंबित मुद्दों से है और उसी के निर्णय के बाद इस पर सुनवाई की जाएगी।
जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने 11 फरवरी को इस मामले में फैसला सुरक्षित रखा था। यह मामला कर्नाटक हाईकोर्ट के 2006 के उस निर्णय को चुनौती देने से जुड़ा है, जिसमें 1997 के अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया था।
यह अधिनियम कर्नाटक के विभिन्न क्षेत्रों में लागू पांच पुराने कानूनों को समेकित कर एक समान व्यवस्था बनाने के उद्देश्य से लाया गया था।
सुनवाई के दौरान सभी पक्षों ने सहमति जताई कि Kantaru Rajeevaru vs. Indian Young Lawyers Association & Ors. (सबरीमाला संदर्भ) में 9-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष जो मुद्दे लंबित हैं, वे इस मामले से समान हैं और उनका निर्णय सीधे तौर पर इस मामले को प्रभावित करेगा। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने 11 फरवरी के अपने आदेश को वापस लेते हुए कहा कि इस मामले की सुनवाई संविधान पीठ के फैसले के बाद की जाएगी।
हाईकोर्ट में मामला:
इससे पहले हाईकोर्ट में दायर याचिकाओं में अधिनियम की संवैधानिक वैधता और इसके तहत जारी कुछ अधिसूचनाओं को चुनौती दी गई थी। 9 सितंबर 2005 को एकल पीठ ने अधिनियम को वैध ठहराया था।
हालांकि, अपील में डिवीजन बेंच ने पाया कि अधिनियम की धारा 1(4) के तहत मठों और संप्रदायिक मंदिरों को बाहर रखना तथा धारा 2(16) के तहत बौद्ध, जैन और सिख समुदाय को “हिंदू” की परिभाषा से बाहर रखना अनुच्छेद 14 के तहत भेदभावपूर्ण है। कोर्ट ने कहा कि राज्य इस वर्गीकरण को उचित ठहराने में विफल रहा है।
सबरीमाला संदर्भ से संबंध:
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामला उन संवैधानिक प्रश्नों से जुड़ा है, जिन पर 9-न्यायाधीशों की संविधान पीठ विचार कर रही है। इनमें मुख्य रूप से धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25), धार्मिक संप्रदायों के अधिकार (अनुच्छेद 26), “संवैधानिक नैतिकता” की व्याख्या, धार्मिक प्रथाओं पर न्यायिक समीक्षा की सीमा, तथा क्या कोई बाहरी व्यक्ति किसी धार्मिक प्रथा को चुनौती दे सकता है—जैसे अहम प्रश्न शामिल हैं।
इन सभी मुद्दों पर संविधान पीठ के अंतिम निर्णय के बाद ही इस मामले में आगे की सुनवाई होगी।

