सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: जिस उद्योग के लिए नीति बनी ही नहीं, उसे 'प्रॉमिसरी एसटॉपल' के आधार पर लाभ नहीं मिल सकता

Praveen Mishra

26 May 2026 3:26 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: जिस उद्योग के लिए नीति बनी ही नहीं, उसे प्रॉमिसरी एसटॉपल के आधार पर लाभ नहीं मिल सकता

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (25 मई) को कहा कि 'प्रॉमिसरी एसटॉपल' (Promissory Estoppel) के सिद्धांत का इस्तेमाल करके कोई उद्योग सरकार की ऐसी नीति का लाभ नहीं मांग सकता, जो मूल रूप से उस श्रेणी के उद्योगों के लिए बनाई ही नहीं गई हो।

    जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें एक पुराने औद्योगिक इकाई को औद्योगिक नीति 2019 के तहत रियायती बिजली दरों का लाभ देने का निर्देश दिया गया था।

    मामला एक मेटल प्रोसेसिंग और स्टैम्पिंग कंपनी से जुड़ा था, जो वर्ष 2005-06 से संचालित हो रही थी। कंपनी ने 2020 में अपने प्लांट और मशीनरी में लगभग 88.69 प्रतिशत विस्तार किया था और अतिरिक्त रोजगार भी सृजित किया था। कंपनी का दावा था कि औद्योगिक नीति की धारा 16(a) में प्रयुक्त “eligible enterprises” शब्द के आधार पर उसे भी रियायती बिजली दरों का लाभ मिलना चाहिए।

    हालांकि राज्य सरकार ने तर्क दिया कि यह नीति केवल नई औद्योगिक इकाइयों के लिए थी और “eligible” शब्द का इस्तेमाल ड्राफ्टिंग त्रुटि थी। सरकार ने कहा कि पहले से मौजूद उद्योगों को केवल धारा 16(b) के तहत अतिरिक्त बिजली खपत पर 15 प्रतिशत रिबेट का लाभ दिया जाना था, जो कंपनी पहले ही ले चुकी थी।

    सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की दलील स्वीकार करते हुए कहा कि यदि कोई नीति किसी विशेष श्रेणी के उद्योगों के लिए बनाई ही नहीं गई है, तो उस पर 'प्रॉमिसरी एसटॉपल' का दावा नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि कंपनी को पहले ही नीति के तहत एक लाभ मिल चुका है और अतिरिक्त रियायती बिजली दर देना “डबल बेनिफिट” होगा, जो सार्वजनिक हित और वित्तीय अनुशासन के खिलाफ है।

    फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 'प्रॉमिसरी एसटॉपल' सिद्धांत से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत भी स्पष्ट किए। कोर्ट ने कहा कि यह सिद्धांत निष्पक्षता, न्याय और सद्भावना पर आधारित है तथा राज्य अपने वादों से मनमाने ढंग से पीछे नहीं हट सकता। हालांकि यह सिद्धांत तभी लागू होगा, जब संबंधित व्यक्ति या संस्था वास्तव में उस नीति के दायरे में आती हो।

    इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील मंजूर करते हुए हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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