अभियोजन की स्वीकृति (Sanction) में देरी कर किसी नागरिक की स्वतंत्रता नहीं छीनी जा सकती: भ्रष्टाचार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने लोक सेवक को दी जमानत

  • अभियोजन की स्वीकृति (Sanction) में देरी कर किसी नागरिक की स्वतंत्रता नहीं छीनी जा सकती: भ्रष्टाचार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने लोक सेवक को दी जमानत

    सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (Prevention of Corruption Act) के एक मामले में आरोपी लोक सेवक को नियमित जमानत (Regular Bail) देते हुए कहा है कि अभियोजन की स्वीकृति (Sanction) देने में हुई देरी का नुकसान किसी नागरिक को उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित करके नहीं पहुंचाया जा सकता।

    जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की खंडपीठ ने यह आदेश उस मामले में पारित किया, जिसमें आरोपी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

    आरोपी को 9 दिसंबर 2025 को गिरफ्तार किया गया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 20 मार्च 2026 को उसकी नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

    सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने अदालत को बताया कि 7 फरवरी 2026 को आरोपपत्र (Chargesheet) दाखिल किया जा चुका है और अभियोजन पक्ष 19 गवाहों से साक्ष्य कराना चाहता है।

    हालांकि, चूंकि आरोपी एक लोक सेवक है, इसलिए उसके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए राज्य सरकार से आवश्यक अभियोजन स्वीकृति (Sanction) अभी तक प्राप्त नहीं हुई है। ऐसे में ट्रायल कोर्ट मामले का संज्ञान भी नहीं ले सकता।

    इस पर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के वकील से पूछा कि क्या अभियोजन स्वीकृति दी गई है। जब कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिला तो पीठ ने आश्चर्य व्यक्त किया कि आरोपपत्र दाखिल होने के कई महीने बाद भी सक्षम प्राधिकारी ने इस संबंध में कोई निर्णय नहीं लिया।

    अदालत ने कहा, "हम यह मानकर चल रहे हैं कि अभियोजन स्वीकृति अभी तक नहीं दी गई है। 7 फरवरी 2026 को आरोपपत्र दाखिल होने के बावजूद स्वीकृति देने वाला प्राधिकारी अब तक सक्रिय नहीं हुआ है।

    अभियोजन स्वीकृति देने में हुई देरी का उपयोग किसी नागरिक की स्वतंत्रता सीमित करने के लिए नहीं किया जा सकता।"

    इन परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को नियमित जमानत प्रदान कर दी। साथ ही अदालत ने उसे सभी सुनवाई में नियमित रूप से उपस्थित रहने सहित आवश्यक जमानत शर्तों का पालन करने का निर्देश दिया।

    पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि आदेश में की गई टिप्पणियां केवल जमानत पर निर्णय तक सीमित हैं और मुकदमे के गुण-दोष पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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