रिश्वत लेते समय अधिकारी के साथ मौजूद होना मात्र आपराधिक साजिश साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं: सुप्रीम कोर्ट

Praveen Mishra

30 Jun 2026 3:34 PM IST

  • रिश्वत लेते समय अधिकारी के साथ मौजूद होना मात्र आपराधिक साजिश साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि केवल इस आधार पर कि कोई लोक सेवक उस स्थान पर मौजूद था जहां कथित रूप से रिश्वत ली गई, उसके खिलाफ आपराधिक साजिश (क्रिमिनल कॉन्सपिरेसी) का आरोप सिद्ध नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि साजिश साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष को ठोस साक्ष्यों के माध्यम से यह दिखाना होगा कि आरोपियों के बीच पहले से 'मीटिंग ऑफ माइंड्स' (पूर्व सहमति) थी।

    जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दायर अपीलों को खारिज करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें तीन केंद्रीय उत्पाद शुल्क (Central Excise) अधिकारियों को बरी किया गया था।

    मामला वर्ष 1995 के सीबीआई ट्रैप से जुड़ा है। आरोप था कि तत्कालीन सेंट्रल एक्साइज सुपरिंटेंडेंट आर.के. श्रीवास्तव ने एक फैक्ट्री से जब्त दस्तावेज लौटाने के बदले ₹80,000 रिश्वत की मांग की थी। अभियोजन का दावा था कि इंस्पेक्टर ए.के. गाबा, आलोक गुप्ता और दुष्यंत कुमार भी इस साजिश का हिस्सा थे क्योंकि वे कथित रिश्वत मांगने या लेने के दौरान मौके पर मौजूद थे।

    ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी (आपराधिक साजिश) के तहत दोषी ठहराया था। हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह कहते हुए उन्हें बरी कर दिया कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग, स्वीकार करने और साजिश को साबित करने में विफल रहा।

    सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि सिर्फ संदेह, संबंध या मौके पर मौजूदगी के आधार पर आपराधिक साजिश का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। अदालत ने कहा कि साजिश तभी सिद्ध होगी जब आरोपियों के बीच किसी अवैध कार्य को अंजाम देने के लिए पूर्व सहमति और साझा आपराधिक मंशा के ठोस प्रमाण हों।

    पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह दिखाने में पूरी तरह विफल रहा कि तीनों अधिकारियों और मुख्य आरोपी आर.के. श्रीवास्तव के बीच पहले से कोई समझौता या साझा योजना थी। अदालत ने यह भी कहा कि रिश्वत की मांग का मुख्य आरोप केवल आर.के. श्रीवास्तव पर था और अन्य अधिकारियों की सक्रिय भूमिका का कोई स्वतंत्र साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं है।

    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि अभियोजन पक्ष उस टेप रिकॉर्डिंग को पेश नहीं कर सका, जिसमें शिकायतकर्ता के अनुसार रिश्वत की मांग दर्ज थी। अदालत ने कहा कि ऐसे महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को प्रस्तुत न करने पर अभियोजन के खिलाफ प्रतिकूल अनुमान (Adverse Inference) लगाया जा सकता है।

    इन सभी तथ्यों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की अपील खारिज करते हुए तीनों अधिकारियों की बरी होने के फैसले को बरकरार रखा।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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