POCSO पीड़ित बच्चों की मनोवैज्ञानिक जांच केवल जरूरत पड़ने पर हो: सुप्रीम कोर्ट
Praveen Mishra
11 Jun 2026 9:46 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अभिरक्षा (कस्टडी), मुलाकात और माता-पिता के पहुंच अधिकार से जुड़े मामलों में बच्चों की मनोवैज्ञानिक जांच केवल आवश्यकता पड़ने पर ही कराई जानी चाहिए। विशेष रूप से यौन शोषण के कथित पीड़ित बच्चों के मामलों में उनके जीवन में न्यूनतम हस्तक्षेप ही सामान्य नियम होना चाहिए।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश में संशोधन करते हुए की, जिसमें एक नाबालिग बच्ची की मनोवैज्ञानिक जांच के लिए विशेषज्ञों के पैनल के गठन का निर्देश दिया गया था। बच्ची ने अपने पिता पर यौन शोषण के आरोप लगाए हैं और मामला POCSO अधिनियम के तहत लंबित है।
अदालत ने कहा कि POCSO कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यौन शोषण का शिकार बच्चा ऐसी प्रक्रियाओं से न गुजरे, जिससे उसे और अधिक भावनात्मक आघात पहुंचे। कोर्ट ने निर्देश दिया कि पहले दोनों माता-पिता, विशेष रूप से मां, की मनोवैज्ञानिक स्थिति का आकलन किया जाए। इसके बाद फैमिली कोर्ट तय करेगा कि बच्चे की प्रत्यक्ष मनोवैज्ञानिक जांच आवश्यक है या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालतों को "पैरेंटल एलियनेशन सिंड्रोम" और "फॉल्स मेमोरी क्रिएशन" जैसी चिंताओं के प्रति सतर्क रहना चाहिए। साथ ही स्पष्ट किया कि बच्चों के कल्याण से जुड़े मामलों में कोई एक समान या कठोर नियम लागू नहीं किया जा सकता और प्रत्येक मामले का फैसला उसकी परिस्थितियों के अनुसार किया जाना चाहिए।

