सबरीमाला केस: 'नैतिकता' की व्याख्या पर सुप्रीम कोर्ट में बहस, संवैधानिक बनाम सामाजिक नैतिकता पर मतभेद
Praveen Mishra
5 May 2026 2:24 PM IST

सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष सबरीमाला संदर्भ मामले में यह अहम सवाल उठा कि अनुच्छेद 25 और 26 में 'नैतिकता' शब्द की व्याख्या कैसे की जाए, जो धार्मिक स्वतंत्रता पर एक सीमा के रूप में लागू होता है।
केंद्र सरकार और पुनर्विचार याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि “संवैधानिक नैतिकता” का कोई स्थान नहीं है, क्योंकि यह व्यक्तिपरक है, और “सार्वजनिक नैतिकता” ही मान्य होनी चाहिए, जो संसद के माध्यम से लोगों की इच्छा को दर्शाती है।
वहीं, प्रतिवादियों की ओर से सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने कहा कि नैतिकता को बहुसंख्यक समाज की सोच से निर्धारित नहीं किया जा सकता, क्योंकि सामाजिक नैतिकता पूर्वाग्रहों से प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने तर्क दिया कि महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध “शुद्धता और अशुद्धता” की अवधारणा पर आधारित है, जो अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता निषेध) और समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने यह भी सवाल उठाया कि क्या लंबे समय से चली आ रही परंपराओं को केवल इसी आधार पर असंवैधानिक ठहराया जा सकता है। साथ ही, 'आवश्यक धार्मिक प्रथा' (Essential Religious Practice) परीक्षण की भूमिका पर भी गहन बहस हुई।
मामले की सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि अदालत को धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और सामाजिक सुधार के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए 'नैतिकता' की सही व्याख्या तय करनी होगी।

