देवराजस्वामी मंदिर विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस संजय किशन कौल को किया मध्यस्थ नियुक्त

Praveen Mishra

28 Jan 2026 3:57 PM IST

  • देवराजस्वामी मंदिर विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस संजय किशन कौल को किया मध्यस्थ नियुक्त

    सुप्रीम कोर्ट ने आज तमिलनाडु के कांचीपुरम स्थित श्री देवराजस्वामी मंदिर में अनुष्ठान और प्रार्थनाओं को लेकर चल रहे लगभग 120 वर्ष पुराने विवाद के समाधान के लिए पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजय किशन कौल को प्रधान मध्यस्थ (Principal Mediator) नियुक्त किया है। यह विवाद श्रीवैष्णव संप्रदाय के वडकलई और थेंकलई संप्रदायों के बीच मंदिर के गर्भगृह में मंत्रोच्चार और पूजा-अनुष्ठान के अधिकार को लेकर है।

    यह आदेश चीफ़ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने पारित किया। पीठ मद्रास हाईकोर्ट के उस निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें वडकलई संप्रदाय को श्री देवराजस्वामी मंदिर के गर्भगृह में प्रार्थनाएँ करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया था।

    याचिकाकर्ताओं की दलीलें

    याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट सी.एस. वैद्यनाथन (एडवोकेट रोनक शंकर अग्रवाल की सहायता से), सतीश पराशरण और अरविंद पी. दातार ने पक्ष रखा।

    याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क था कि मद्रास हाईकोर्ट का आदेश:

    संविधान-पूर्व निर्णयों पर आधारित है, जिनमें दक्षिणी (थेंकलई) संप्रदाय के वंशानुगत आध्यापक मिरासी अधिकारों को मान्यता दी गई थी, जो संविधान के अनुच्छेद 25 के विपरीत है;

    तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्त (संशोधन) अधिनियम, 1971 को नजरअंदाज करता है, जिसने मंदिरों में वंशानुगत धार्मिक सेवाओं को समाप्त कर दिया है, और इसलिए ऐसे पुराने निर्णय अब प्रासंगिक नहीं हैं;

    हाईकोर्ट ने वडकलई संप्रदाय को एक धार्मिक संप्रदाय के रूप में मान्यता तो दी, लेकिन प्रार्थना की अनुमति केवल थेंकलई संप्रदाय को देकर वडकलई संप्रदाय के मौलिक अधिकारों को सीमित कर दिया।

    प्रतिवादियों की दलीलें

    प्रतिवादियों की ओर से सीनियर एडवोकेट सी.ए. सुंदरम और गुरु कृष्ण कुमार ने दलील दी कि थेंकलई संप्रदाय द्वारा किए जाने वाले मंत्रोच्चार 300 वर्ष से अधिक पुराने हैं और मंदिर की स्थापित परंपराओं के अनुरूप हैं।

    अदालत की टिप्पणी और मध्यस्थता

    सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट अरविंद पी. दातार ने कहा कि अदालतों को 'भाईचारे (fraternity)' की भावना को बढ़ावा देना चाहिए और दोनों संप्रदायों को आपसी सहमति से समाधान तलाशना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि कोविड काल के दौरान एक लचीला समाधान अपनाया गया था, जिसमें पहले 20 सेकंड एक संप्रदाय और अगले 20 सेकंड दूसरा संप्रदाय अपने-अपने मंत्रों का जाप करता था। हालांकि, बाद में मंदिर प्रशासन ने केवल थेंकलई संप्रदाय को ही मंत्रोच्चार की अनुमति दे दी।

    खंडपीठ ने नोट किया कि दोनों पक्ष सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए मध्यस्थता पर सहमत हो गए हैं।

    अदालत का आदेश

    इस सहमति को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया:

    “वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने सहर्ष मध्यस्थता के लिए सहमति व्यक्त की है, ताकि दैनिक अनुष्ठान सौहार्दपूर्ण ढंग से संपन्न हो सकें। इस उद्देश्य से हम इस न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजय किशन कौल से अनुरोध करते हैं कि वे प्रधान मध्यस्थ के रूप में कार्य करें।”

    अदालत ने आगे कहा कि:

    “जस्टिस कौल अपने साथ दो अन्य व्यक्तियों को भी जोड़ सकते हैं, जो तमिल और संस्कृत भाषाओं, मंदिर की धार्मिक परंपराओं और इतिहास से भली-भांति परिचित हों।”

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