NDPS Act: 'अनुच्छेद 21 के मौलिक अधिकारों से समझौता नहीं किया जा सकता', सुप्रीम कोर्ट ने 'सुखविंदर सिंह' फैसले पर जताई असहमति

  • NDPS Act: अनुच्छेद 21 के मौलिक अधिकारों से समझौता नहीं किया जा सकता, सुप्रीम कोर्ट ने सुखविंदर सिंह फैसले पर जताई असहमति

    सुप्रीम कोर्ट ने NDPS Act के तहत जमानत से जुड़े एक अन्य दो जजों की पीठ के फैसले पर गंभीर आपत्ति जताई है। जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने कहा कि State of Punjab v. Sukhwinder Singh @ Gora (2026) में की गई टिप्पणियां तीन जजों की पीठ के फैसले Union of India v. K.A. Najeeb (2021) के विपरीत प्रतीत होती हैं।

    पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार मौलिक अधिकार है। किसी विशेष कानून के प्रावधान के आधार पर भी इन अधिकारों से हल्के में समझौता नहीं किया जा सकता।

    सुखविंदर सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने कहा था कि NDPS Act की धारा 37 के तहत जमानत देने की कठोर शर्तों को केवल मुकदमे में देरी के आधार पर दरकिनार नहीं किया जा सकता। पीठ ने माना था कि अनुच्छेद 21 के तहत शीघ्र सुनवाई का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन व्यावसायिक मात्रा से जुड़े NDPS मामलों में जमानत देते समय धारा 37 की शर्तों का पालन करना होगा।

    हालांकि, Sujit Das v. Union of India में फैसला सुनाते हुए जस्टिस भुइयां की पीठ ने इस दृष्टिकोण पर अपनी असहमति व्यक्त की।

    पीठ ने कहा कि K.A. Najeeb मामले में तीन जजों की पीठ ने स्पष्ट किया था कि यदि किसी व्यक्ति के शीघ्र सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन होता है, तो संवैधानिक अदालतें कठोर जमानत शर्तों वाले विशेष कानूनों के बावजूद जमानत दे सकती हैं।

    जस्टिस भुइयां ने कहा,

    “संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए अधिकार केवल संवैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार हैं। जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार हमारी संवैधानिक व्यवस्था के केंद्र में है। इन मौलिक अधिकारों के साथ इतनी आसानी से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती, यहां तक कि किसी विशेष कानून के तहत भी नहीं।”

    पीठ ने Union of India v. K.A. Najeeb, Satender Kumar Antil, Mohd. Muslim, Ankur Chadda, Vijay Singh v. Union of India, Sayed Iftikhar Andrabi और Jaskaranjit Singh Dhillon जैसे फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन निर्णयों में यह दोहराया गया है कि अनुच्छेद 21 के उल्लंघन की स्थिति में NDPS Act की धारा 37 जैसी कठोर वैधानिक शर्तों को पीछे हटना होगा।

    पीठ ने यह भी कहा कि Sukhwinder Singh में की गई टिप्पणियां तीन जजों की पीठ के बाध्यकारी फैसले K.A. Najeeb के मद्देनजर per incuriam यानी बाध्यकारी कानूनी प्रावधान या पूर्व निर्णय पर ध्यान दिए बिना दिया गया फैसला मानी जा सकती हैं।

    हालांकि, चूंकि Sukhwinder Singh का फैसला भी समान संख्या वाली दो जजों की पीठ ने दिया था, इसलिए मौजूदा पीठ ने इस पर इससे आगे कोई टिप्पणी करने से परहेज किया।

    क्या था मामला?

    मौजूदा फैसला उन चार आरोपियों की अपील पर सुनाया गया, जिन्होंने त्रिपुरा हाईकोर्ट के जमानत देने से इनकार करने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

    मामले में आरोपियों को 29 सितंबर 2025 को दोपहर 2 बजे तलाशी और जब्ती की कार्रवाई के दौरान हिरासत में लिया गया था। हालांकि, उनकी औपचारिक गिरफ्तारी अगले दिन यानी 30 सितंबर 2025 को सुबह 11 बजे दिखाई गई।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की समय-सीमा उस समय से शुरू होती है, जब व्यक्ति की स्वतंत्रता वास्तव में छीन ली जाती है, न कि औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज किए जाने के समय से।

    इसलिए आरोपियों को 29 सितंबर 2025 को दोपहर 2 बजे से 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए था। ऐसा नहीं किए जाने के कारण अनुच्छेद 22(2) का उल्लंघन हुआ, जिससे उनकी गिरफ्तारी अवैध हो गई।

    पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि जब अनुच्छेद 22(2) का उल्लंघन होता है, तो NDPS Act की धारा 37 के तहत जमानत की कठोर शर्तें हिरासत से रिहाई के रास्ते में बाधा नहीं बन सकतीं।

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    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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