फोन पर दवा बताने से डॉक्टर अपराधी नहीं बन जाता: सुप्रीम कोर्ट ने एनेस्थेटिस्ट को दी राहत

Praveen Mishra

26 May 2026 3:39 PM IST

  • फोन पर दवा बताने से डॉक्टर अपराधी नहीं बन जाता: सुप्रीम कोर्ट ने एनेस्थेटिस्ट को दी राहत

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (25 मई) को एक एनेस्थेटिस्ट डॉक्टर को मेडिकल लापरवाही के आपराधिक मामले से बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ड्यूटी समाप्त होने के बाद फोन पर नर्स को दवा सुझाने मात्र से डॉक्टर को मरीज की मौत के लिए IPC की धारा 304-A के तहत आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

    जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने केरल हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें डॉक्टर के खिलाफ मेडिकल नेग्लिजेंस का मामला खत्म करने से इनकार किया गया था।

    मामला 2002 का है, जब कन्नूर के धनलक्ष्मी अस्पताल में बवासीर की सर्जरी के बाद मरीज को तेज दर्द की शिकायत हुई। आरोप था कि वरिष्ठ एनेस्थेटिस्ट डॉक्टर ने अस्पताल लौटकर इलाज करने के बजाय फोन पर नर्स को “सेंसरकेन” नामक दर्द निवारक दवा देने की सलाह दी। बाद में मरीज की तबीयत बिगड़ गई और उसकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण हृदय की गंभीर समस्या बताया गया।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डॉक्टर अपनी शिफ्ट पूरी कर मरीज को स्थिर हालत में छोड़कर गई थीं। आपात स्थिति के समय अस्पताल में अन्य ड्यूटी डॉक्टर और एक ऑन-ड्यूटी एनेस्थेटिस्ट मौजूद थे। ऐसे में नर्स द्वारा दवा सही तरीके से न देने के लिए ऑफ-ड्यूटी डॉक्टर को आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि फोन पर दर्द निवारक दवा सुझाना सामान्य चिकित्सकीय सलाह है, इसे “गंभीर आपराधिक लापरवाही” नहीं माना जा सकता। पीठ ने दोहराया कि किसी डॉक्टर पर आपराधिक मुकदमा तभी चल सकता है, जब उसका आचरण इतना लापरवाह हो कि कोई सामान्य समझ वाला डॉक्टर ऐसा न करे।

    सुप्रीम कोर्ट ने जांच प्रक्रिया में भी गंभीर खामी पाई। कोर्ट ने कहा कि मामले की जांच करने वाले मेडिकल एक्सपर्ट पैनल में कोई एनेस्थेटिस्ट शामिल नहीं था, जबकि यह अनिवार्य था। ऐसे में पैनल की रिपोर्ट तकनीकी रूप से विश्वसनीय नहीं मानी जा सकती।

    इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टर के खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही रद्द करते हुए उन्हें मामले से डिस्चार्ज कर दिया।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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