ट्रायल जज को ट्रेनिंग भेजने का हाईकोर्ट का आदेश रद्द, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अपीलीय अदालतें 'मार्गदर्शक' बनें, डराने वाली नहीं

Praveen Mishra

16 July 2026 3:50 PM IST

  • ट्रायल जज को ट्रेनिंग भेजने का हाईकोर्ट का आदेश रद्द, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अपीलीय अदालतें मार्गदर्शक बनें, डराने वाली नहीं

    सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें त्रिशूर के प्रधान सब जज को वसीयत (Will) विवाद से जुड़े मामले में उनके फैसले की आलोचना करते हुए केरल ज्यूडिशियल एकेडमी में प्रशिक्षण (Training) के लिए भेजने का निर्देश दिया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि अपीलीय अदालतों का काम अधीनस्थ न्यायालयों का मार्गदर्शन करना है, न कि उच्च पद का रौब दिखाते हुए उन्हें कठोर टिप्पणियों का निशाना बनाना।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने कहा कि हाईकोर्ट द्वारा ट्रायल जज के खिलाफ की गई टिप्पणियां न्यायिक संयम (Judicial Restraint) के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत थीं।

    मामला एक पारिवारिक संपत्ति विवाद से जुड़ा था, जिसमें कथित वसीयत की वैधता पर सवाल था। ट्रायल कोर्ट ने वसीयत को विधिवत सिद्ध न मानते हुए संपत्ति के बंटवारे (Partition) का प्रारंभिक डिक्री पारित की थी। हालांकि, केरल हाईकोर्ट ने संक्षिप्त आदेश में इस फैसले को पलटते हुए कहा कि ट्रायल जज विवाद को सही ढंग से समझने में विफल रहे और उन्हें प्रशिक्षण के लिए भेजने का निर्देश दे दिया।

    सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों को पलटते समय साक्ष्यों का स्वतंत्र विश्लेषण नहीं किया और यह भी स्पष्ट नहीं किया कि ट्रायल कोर्ट की त्रुटि क्या थी। अदालत ने कहा कि प्रथम अपीलीय अदालत (First Appellate Court) तथ्यों की अंतिम अदालत होती है और उसे ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों को पलटते समय तथ्यों और कानून का स्वतंत्र मूल्यांकन करते हुए ठोस कारण दर्ज करने होते हैं।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि ऐसे आदेशों को बरकरार रखा गया तो यह गलत संदेश जाएगा कि ट्रायल कोर्ट के फैसलों को बिना पर्याप्त विचार और कारणों के पलटा जा सकता है।

    पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि अपीलीय अदालतों का रवैया "मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक" (Friend, Philosopher and Guide) जैसा होना चाहिए, न कि "श्रेष्ठता का डंडा" चलाकर अधीनस्थ न्यायाधीशों की गलतियां गिनाने वाला।

    अदालत ने यह भी दोहराया कि किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां तभी की जानी चाहिए जब वे मामले के निर्णय के लिए आवश्यक हों, पर्याप्त साक्ष्यों पर आधारित हों और संबंधित अधिकारी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया हो।

    इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट का फैसला और ट्रायल जज को प्रशिक्षण के लिए भेजने का निर्देश रद्द कर दिया। साथ ही, मामले को नए सिरे से मेरिट के आधार पर सुनवाई के लिए केरल हाईकोर्ट को वापस भेज दिया।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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