“सोशल मीडिया पर क्यों गईं?”: फ्लाइट यौन उत्पीड़न पोस्ट हटाने के HC आदेश में दखल से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

Praveen Mishra

27 May 2026 5:08 PM IST

  • “सोशल मीडिया पर क्यों गईं?”: फ्लाइट यौन उत्पीड़न पोस्ट हटाने के HC आदेश में दखल से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

    सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को उस पत्रकार की विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज कर दी, जिसने दिल्ली हाईकोर्ट के उस अंतरिम आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे सोशल मीडिया से वह पोस्ट हटाने का निर्देश दिया गया था, जिसमें उसने फ्लाइट के दौरान एक सह-यात्री पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था।

    जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने दिल्ली हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

    सुनवाई के दौरान पत्रकार की ओर से कहा गया कि वह 24 वर्षीय पत्रकार और यौन हिंसा की पीड़िता है। उसके वकील ने दलील दी कि आरोपी व्यक्ति ने जल्दबाज़ी में हाईकोर्ट जाकर अंतरिम राहत हासिल कर ली। वकील ने कहा कि पत्रकार ने केवल तथ्य साझा किए थे और मामले में FIR भी दर्ज कराई गई है।

    हालांकि, जस्टिस नागरत्ना ने सोशल मीडिया पर आरोप सार्वजनिक करने के फैसले पर सवाल उठाया। उन्होंने पूछा:

    “आप सोशल मीडिया पर क्यों गईं और खुद को क्यों उजागर किया?”

    कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे सार्वजनिक आरोपों के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि संबंधित व्यक्ति अपनी नौकरी तक खो चुका है और यही कारण है कि उसने इसे मानहानि बताया है।

    पत्रकार की ओर से यह दलील दी गई कि मानहानि तभी मानी जा सकती है जब आरोप दुर्भावनापूर्ण या स्पष्ट रूप से झूठे हों। लेकिन कोर्ट ने कहा कि “प्रतिष्ठा का अधिकार” भी एक महत्वपूर्ण अधिकार है।

    मामला 11 मार्च की उस सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़ा है, जिसमें पत्रकार ने मुंबई से दिल्ली की फ्लाइट के दौरान यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था और कथित आरोपी की तस्वीर भी साझा की थी। इसके बाद आरोपी व्यक्ति ने दिल्ली हाईकोर्ट में मानहानि का मुकदमा दायर कर पोस्ट हटाने की मांग की थी।

    दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने भी पहले कहा था कि पोस्ट लगभग 20-22 दिनों तक ऑनलाइन रह चुकी है और पत्रकार FIR दर्ज करा चुकी है, इसलिए अस्थायी रूप से पोस्ट हटाने से उसके अधिकार प्रभावित नहीं होंगे।

    हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूर्ण अधिकार नहीं है और इसे संविधान के तहत “उचित प्रतिबंधों” के अधीन पढ़ा जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा था कि व्यक्तिगत अनुभव साझा करने और किसी को कानूनी फैसला आने से पहले दोषी की तरह प्रस्तुत करने में फर्क होता है, खासकर तब जब आरोपी की तस्वीर भी सार्वजनिक की गई हो।

    सुनवाई के अंत में जस्टिस नागरत्ना ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि इस तरह के आरोप लगातार लगाए जाते रहे, तो सार्वजनिक स्थानों पर पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग व्यवस्था की मांग उठ सकती है।

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