'मिहिर शाह' फ़ैसले के अनुसार गिरफ़्तारी के आधार लिखित में न देने पर सुप्रीम कोर्ट ने NDPS मामले में डॉक्टरों को दी ज़मानत

Shahadat

5 April 2026 6:20 PM IST

  • मिहिर शाह फ़ैसले के अनुसार गिरफ़्तारी के आधार लिखित में न देने पर सुप्रीम कोर्ट ने NDPS मामले में डॉक्टरों को दी ज़मानत

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में नशीले पदार्थों से जुड़े मामले में आरोपी दो मेडिकल प्रोफ़ेशनल्स को इस आधार पर ज़मानत दी कि उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से पहले गिरफ़्तारी के आधार लिखित में नहीं दिए गए।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने यह आदेश देते हुए कहा कि 'मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले के निर्देश के अनुसार, आरोपी को गिरफ़्तारी के आधार दिए जाने चाहिए थे।

    'मिहिर राजेश शाह' मामले में पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) बी.आर. गवई और जस्टिस ए.जी. मसीह की बेंच ने फ़ैसला दिया था कि अगर किसी गिरफ़्तार व्यक्ति को गिरफ़्तारी के आधार लिखित में उसकी समझ में आने वाली भाषा में नहीं दिए जाते हैं, तो उसकी गिरफ़्तारी और उसके बाद की रिमांड अवैध मानी जाएगी।

    इस मिसाल का ज़िक्र करते हुए मौजूदा मामले में बेंच ने कहा,

    "गिरफ़्तारी मेमो से ही यह साफ़ होता है कि औपचारिक गिरफ़्तारी की प्रक्रिया शुरू करने से पहले आरोपी को गिरफ़्तारी के आधार मौखिक रूप से समझा दिए गए। इसलिए गिरफ़्तार करने वाले अधिकारी की यह ज़िम्मेदारी थी कि वह 'मिहिर राजेश शाह' (ऊपर बताए गए मामले) के निर्देश के अनुसार, आरोपी को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से दो घंटे पहले गिरफ़्तारी के आधारों वाला मेमो लिखित में दे, जिसका इस मामले में साफ़ तौर पर पालन नहीं किया गया।"

    संक्षेप में मामला

    दोनों ही अपीलकर्ता अमृतसर के अस्पताल के संचालन से जुड़े मेडिकल प्रोफ़ेशनल्स हैं। उनको NDPS के एक ऐसे मामले में गिरफ़्तार किया गया था, जिसमें ट्रामाडोल टैबलेट्स ज़ब्त की गईं।

    दावों के अनुसार, उन्होंने एक दवा कंपनी से 200 ट्रामाडोल टैबलेट्स की सप्लाई का ऑर्डर दिया (अस्पताल में मरीज़ों के इलाज के लिए)। हालांकि, एक गलती की वजह से दवा कंपनी ने 2000 टैबलेट्स सप्लाई कर दीं। अस्पताल ने पूरी खेप को सीलबंद हालत में ही रख लिया और कंपनी को एक पत्र भेजकर अतिरिक्त 1800 टैबलेट्स वापस लेने को कहा।

    हालांकि, अतिरिक्त खेप वापस किए जाने से पहले ही नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने दवा कंपनी पर छापा मारा और 31,900 ट्रामाडोल टैबलेट्स बरामद कर लीं। इस ज़ब्ती के बाद नशीले पदार्थों से जुड़ा एक मामला दर्ज किया गया और अस्पताल के मेडिकल स्टोर में तलाशी ली गई, जहां से 2000 टैबलेट्स वाली सीलबंद खेप बरामद कर ली गई। गिरफ़्तार होने के बाद अपीलकर्ताओं को 03.05.2025 को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

    शुरू में उन्होंने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में ज़मानत की अर्ज़ी दी, जिसमें खास तौर पर यह दलील दी गई कि हिरासत में लिए जाने से पहले उन्हें गिरफ़्तारी के आधार नहीं बताए गए, लेकिन उनकी अर्ज़ियां खारिज कर दी गईं। इससे दुखी होकर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

    सुप्रीम कोर्ट के सामने यह दलील दी गई कि अपीलकर्ताओं को गिरफ़्तारी के आधार लिखित रूप में न देना संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। यह तर्क दिया गया कि गिरफ़्तारी मेमो में केस के विवरण का सिर्फ़ ज़िक्र करना काफ़ी नहीं था, और इसलिए गिरफ़्तारी गैर-कानूनी थी।

    दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने इसका जवाब देते हुए कहा कि 2000 ट्रामाडोल गोलियों की खेप अपीलकर्ताओं के अस्पताल ने जान-बूझकर मंगवाई, जबकि उनके लाइसेंस में ट्रामाडोल को अनुमत चीज़ों की सूची से बाहर रखा गया। आगे यह भी तर्क दिया गया कि गिरफ़्तारी के आधार अपीलकर्ताओं को समझा दिए गए और गिरफ़्तारी मेमो में भी दिए गए।

    दोनों पक्षकारों की दलीलें सुनने और उपलब्ध सामग्री पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा कि मौजूदा मामले में 'मिहिर राजेश शाह' केस के निर्देशों का पालन नहीं किया गया। हालांकि, यह कहा गया कि गिरफ़्तारी के आधार आरोपी को मौखिक रूप से समझा दिए गए, लेकिन उन्हें लिखित रूप में नहीं दिया गया।

    कोर्ट ने कहा,

    "अब यह बात पूरी तरह से तय हो चुकी है कि गिरफ़्तारी से पहले, या किसी खास मामले में असाधारण परिस्थितियों में गिरफ़्तारी के तुरंत बाद आरोपी को गिरफ़्तारी के आधार लिखित रूप में देना भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के साथ पढ़े जाने वाले अनुच्छेद 22(1) के तहत दी गई संवैधानिक गारंटियों का अनिवार्य हिस्सा है। 'मिहिर राजेश शाह' (ऊपर उल्लिखित) फ़ैसले का मुख्य निष्कर्ष यह है कि अगर ऊपर बताए गए सिद्धांत से ज़रा भी भटकाव होता है तो आरोपी की गिरफ़्तारी को गैर-कानूनी घोषित कर दिया जाएगा। ऐसे आरोपी को तुरंत रिहा किए जाने का अधिकार मिल जाएगा।"

    तदनुसार, अपीलकर्ताओं को ज़मानत दी गई।

    Case Title: DR. RAJINDER RAJAN VERSUS UNION OF INDIA & ANR, SLP(Crl.) No(s). 3326 of 2026

    Next Story