फिल्म फ्लॉप हो सकती है; निवेश पर लाभ न मिलने से धोखाधड़ी नहीं बनती: सुप्रीम कोर्ट

Praveen Mishra

20 March 2026 1:02 PM IST

  • फिल्म फ्लॉप हो सकती है; निवेश पर लाभ न मिलने से धोखाधड़ी नहीं बनती: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल इसलिए कि किसी फिल्म में किया गया निवेश लाभ नहीं दे पाया, उसके आधार पर धोखाधड़ी (Section 420 IPC) का आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने कहा कि फिल्म निर्माण स्वभावतः एक जोखिमपूर्ण व्यावसायिक गतिविधि है, जिसमें लाभ की कोई निश्चितता नहीं होती।

    जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की खंडपीठ ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति फिल्म में निवेश कर लाभ में हिस्सेदारी के आधार पर पैसा लगाता है, तो वह शून्य रिटर्न का जोखिम भी स्वीकार करता है। केवल लाभ न मिलना अपने आप में धोखाधड़ी का प्रमाण नहीं है, जब तक यह न दिखाया जाए कि शुरुआत से ही आरोपी की मंशा बेईमानी की थी।

    मामले की पृष्ठभूमि

    मामला एक फिल्म प्रोजेक्ट में निवेश से जुड़ा था, जिसमें शिकायतकर्ता ने 2013 और 2014 में कुल मिलाकर लगभग ₹46.6 लाख निवेश किया था, इस आश्वासन पर कि उसे फिल्म के मुनाफे में हिस्सेदारी मिलेगी। बाद में फिल्म रिलीज हुई, लेकिन अपेक्षित लाभ नहीं मिला। आरोपी द्वारा दिए गए पोस्ट-डेटेड चेक भी बाउंस हो गए, जिसके आधार पर IPC की धारा 406 और 420 के तहत मामला दर्ज किया गया।

    मद्रास हाईकोर्ट ने धारा 406 को खारिज कर दिया, लेकिन धारा 420 के तहत ट्रायल जारी रखने की अनुमति दी। इसके खिलाफ आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

    सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी (Section 415 IPC) के लिए यह आवश्यक है कि वादा करते समय ही आरोपी की मंशा धोखा देने की हो। केवल वादा पूरा न करना या अनुबंध का उल्लंघन, अपने आप में आपराधिक धोखाधड़ी नहीं बनता।

    अदालत ने पाया कि:

    निवेश लाभ में हिस्सेदारी के आधार पर था, न कि निश्चित रिटर्न पर

    फिल्म वास्तव में बनाई और रिलीज की गई

    यह आरोप नहीं था कि आरोपी ने पैसा हड़प लिया या प्रोजेक्ट पूरा नहीं किया

    इसलिए, केवल लाभ न होना या पैसा वापस न मिलना, धोखाधड़ी का अपराध नहीं बनाता।

    अदालत ने यह भी कहा कि पोस्ट-डेटेड चेक का बाउंस होना अपने आप में धोखाधड़ी साबित नहीं करता। ऐसे मामलों में Negotiable Instruments Act की धारा 138 लागू हो सकती है, लेकिन इससे यह नहीं माना जा सकता कि शुरुआत से ही आरोपी की मंशा बेईमानी की थी।

    निष्कर्ष

    अदालत ने कहा कि:

    “सिर्फ वादा पूरा न होना यह साबित नहीं करता कि शुरुआत से ही धोखाधड़ी की मंशा थी।”

    इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने धारा 420 IPC के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द (quash) कर दिया।

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