जब देश पर ड्रग्स के व्यापार से खतरा हो तो व्यक्तिगत आज़ादी से ऊपर देश की संप्रभुता होती है: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

3 Jun 2026 9:36 AM IST

  • जब देश पर ड्रग्स के व्यापार से खतरा हो तो व्यक्तिगत आज़ादी से ऊपर देश की संप्रभुता होती है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को हेरोइन की तस्करी के एक मामले में आरोपी को दी गई रेगुलर ज़मानत रद्द की। कोर्ट ने कहा कि देश की संप्रभुता निजी आज़ादी से ऊपर होनी चाहिए, खासकर उन मामलों में जिनमें ड्रग्स की सप्लाई शामिल हो, क्योंकि इससे लोगों की सेहत और देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ता है।

    कोर्ट ने कहा,

    "अगर देश की संप्रभुता और निजी आज़ादी के बीच कोई टकराव होता है तो बिना किसी शक के, देश की संप्रभुता ही ऊपर मानी जाएगी। खासकर तब, जब देश के खिलाफ कोई जंग छेड़ी गई हो - चाहे वह ड्रग्स की सप्लाई के रूप में ही क्यों न हो - क्योंकि इसका देश की अर्थव्यवस्था और लोगों की सेहत पर बहुत गहरा असर पड़ता है।"

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटान्सेस एक्ट, 1985 (NDPS Act) की धारा 37 के तहत तय की गई दो ज़रूरी शर्तों पर विचार करने में नाकाम रहा। ये शर्तें उन मामलों में ज़मानत देने के लिए लागू होती हैं, जिनमें बड़ी मात्रा में (कमर्शियल क्वांटिटी में) नशीले पदार्थ शामिल होते हैं।

    धारा 37 के तहत ज़मानत देने के लिए कोर्ट को इस बात से संतुष्ट होना ज़रूरी है कि उसके पास यह मानने के लिए ठोस आधार हैं कि आरोपी दोषी नहीं है। साथ ही ज़मानत पर बाहर रहने के दौरान उसके द्वारा कोई और अपराध करने की संभावना नहीं है।

    कोर्ट ने पंजाब सरकार द्वारा दायर उस अपील को मंज़ूर कर लिया, जिसमें हाईकोर्ट के 15 अक्टूबर, 2025 के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके तहत बलराज सिंह उर्फ ​​बिल्ला को ज़मानत पर रिहा किया गया। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने ज़मानत देने से पहले इस बात की जांच नहीं की थी कि क्या धारा 37 के तहत तय की गई कानूनी शर्तें पूरी हुईं या नहीं।

    आरोपी के खिलाफ NDPS Act की धारा 21(c), 29, 61 और 85 के तहत मामला दर्ज किया गया। पुलिस ने पंजाब के वीरम गांव के पास महिंद्रा XUV 300 गाड़ी में सफर कर रहे दो लोगों से कथित तौर पर 1.465 किलोग्राम हेरोइन बरामद की थी।

    सरकारी वकील के मुताबिक, जांच के दौरान दोनों आरोपियों ने बताया कि बलराज सिंह - जो उस समय गोइंदवाल साहिब की सेंट्रल जेल में बंद था - ने उन्हें हेरोइन इकट्ठा करने और उसे आगे सप्लाई करने के लिए अपने पास रखने का निर्देश दिया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बलराज सिंह जेल के अंदर से ही गैर-कानूनी मोबाइल फोन का इस्तेमाल करके ड्रग्स की तस्करी का एक नेटवर्क चला रहा था। तरन तारन की स्पेशल कोर्ट ने 3 जुलाई, 2025 को बलराज सिंह की ज़मानत अर्ज़ी खारिज की। हालांकि, बाद में हाईकोर्ट ने उन्हें ज़मानत दी। हाईकोर्ट ने यह देखते हुए ज़मानत दी कि सिर्फ़ आपराधिक इतिहास के आधार पर ज़मानत से इनकार करना सही नहीं है। साथ ही हिरासत की अवधि और मुक़दमे के पूरा होने में देरी की संभावना को भी ध्यान में रखा।

    सुप्रीम कोर्ट के सामने, राज्य सरकार ने यह दलील दी कि हाई कोर्ट ने NDPS एक्ट की धारा 37 में दी गई रोक को नज़रअंदाज़ कर दिया, जबकि इस मामले में हेरोइन की 'कमर्शियल मात्रा' (व्यावसायिक मात्रा) शामिल थी। सरकार ने यह भी बताया कि आरोपी का इसी तरह का तीन बार आपराधिक इतिहास रहा है।

    आरोपी ने यह तर्क दिया कि उसे झूठा फंसाया गया, उससे कोई बरामदगी नहीं हुई और वह पहले ही एक साल सात महीने हिरासत में बिता चुका है, जबकि अभियोजन पक्ष के चौबीस गवाहों में से सिर्फ़ दो की ही गवाही हो पाई।

    अपील मंज़ूर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फिर से दोहराया कि नशीले पदार्थों की 'कमर्शियल मात्रा' से जुड़े मामलों में ज़मानत देने से पहले कोर्ट को धारा 37 के तहत दी गई 'दोहरी शर्तों' (Twin Conditions) के बारे में अपनी संतुष्टि ज़रूर दर्ज करनी चाहिए।

    सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने उन 'दोहरी शर्तों' पर बिल्कुल भी विचार नहीं किया था। कोर्ट ने आगे यह भी कहा कि NDPS Act के तहत आरोपी के आपराधिक इतिहास को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि ज़मानत पर रहते हुए उसके द्वारा फिर से वैसा ही अपराध करने की संभावना नहीं है।

    कोर्ट ने लंबे समय तक हिरासत में रहने के आधार पर दी गई दलील को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने हिरासत में सिर्फ़ एक साल सात महीने ही बिताए हैं। अगर वह दोषी पाया जाता है तो उसे बीस साल तक की सज़ा हो सकती है। इसलिए कोर्ट ने यह फ़ैसला दिया कि हिरासत की इस अवधि को इतना लंबा नहीं माना जा सकता कि अनुच्छेद 21 के उल्लंघन के आधार पर उसे ज़मानत दी जा सके।

    इसके साथ ही कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि ज़मानत देने के मक़सद से 'लंबे समय तक हिरासत' (Prolonged Incarceration) किसे माना जाए, इस बारे में क़ानून में अभी भी स्पष्टता नहीं है। कोर्ट ने कहा कि NDPS मामलों में, जहां हिरासत की अवधि लगभग एक जैसी ही रही है, अलग-अलग बेंचों ने अलग-अलग फ़ैसले दिए हैं।

    कोर्ट ने हाल ही में 'तसलीम अहमद बनाम दिल्ली सरकार' (Tasleem Ahmed v. State Govt. of NCT of Delhi) मामले में दिए गए संदर्भ का भी ज़िक्र किया। यह संदर्भ उन विशेष क़ानूनों के तहत ज़मानत से जुड़े मामलों में संवैधानिक अदालतों के दृष्टिकोण से संबंधित है, जहां "अनुच्छेद 21, लंबे समय तक हिरासत, और क़ानूनी प्रतिबंध—ये तीनों आपस में एक-दूसरे से जुड़े होते हैं।"

    अदालत ने टिप्पणी की,

    “हालांकि न्यायिक विवेक न्याय देने का महत्वपूर्ण पहलू है, लेकिन यह अदालत इस तथ्य को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती कि हिरासत में बंद समान स्थिति वाले लोगों को अलग-अलग परिणाम मिल सकते हैं, जो संबंधित बेंच द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण पर निर्भर करता है।”

    अदालत ने सीनियर एडवोकेट शदान फरासात द्वारा पेश किए गए चार्ट को रिकॉर्ड किया, जिसमें हिरासत की तुलनीय अवधियों वाले पिछले NDPS मामलों में अलग-अलग परिणामों की ओर ध्यान दिलाया गया।

    हालांकि, लंबित संदर्भ को देखते हुए अदालत ने इस मुद्दे की आगे जांच करने से इनकार किया। अंततः, अदालत ने जमानत देने वाला हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया और राज्य की अपील स्वीकार कर ली।

    Case Title – State of Punjab v. Balraj Singh @ Billa

    Next Story