'Articles 25-26 में morality का मतलब सार्वजनिक नैतिकता नहीं हो सकता, वरना बहुसंख्यक सोच धार्मिक स्वतंत्रता पर हावी हो जाएगी' : सबरीमला संदर्भ में दलील

Praveen Mishra

12 May 2026 3:33 PM IST

  • Articles 25-26 में morality का मतलब सार्वजनिक नैतिकता नहीं हो सकता, वरना बहुसंख्यक सोच धार्मिक स्वतंत्रता पर हावी हो जाएगी : सबरीमला संदर्भ में दलील

    सबरीमला संदर्भ मामले में सीनियर एडवोकेट राजू रामचंद्रन ने सुप्रीम कोर्ट की 9-जजों की संविधान पीठ के समक्ष दलील दी कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 में प्रयुक्त “morality” शब्द का अर्थ सामाजिक या सार्वजनिक नैतिकता नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि यदि morality को बहुसंख्यक समाज की नैतिक धारणाओं के रूप में पढ़ा गया, तो इससे धार्मिक स्वतंत्रताओं को सीमित करने का रास्ता खुल जाएगा।

    राजू रामचंद्रन ने कहा कि संविधान किसी भी मौलिक अधिकार को “अतार्किक बहुसंख्यक भावना” के आधार पर सीमित करने की अनुमति नहीं देता। उन्होंने कहा कि morality को केवल संवैधानिक मूल्यों के संदर्भ में ही समझा जाना चाहिए, क्योंकि यही मौलिक अधिकारों की व्याख्या का तार्किक और वैधानिक तरीका है।

    उन्होंने कहा कि “constitutional morality”, “constitutional ethos” या “constitutional conscience” जैसे शब्द अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन इनका उद्देश्य संविधान के मूल मूल्यों के आधार पर मौलिक अधिकारों की व्याख्या करना है।

    राजू रामचंद्रन दाऊदी बोहरा समुदाय में बहिष्कार (excommunication) की प्रथा का विरोध करने वाले सुधारवादी समूह की ओर से पेश हुए। उन्होंने तर्क दिया कि किसी व्यक्ति का सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार उसकी “civil death” के समान है और यह समानता, स्वतंत्रता तथा गरिमा के संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ है।

    उन्होंने कहा कि भले ही बहिष्कार पहली नजर में धार्मिक प्रथा लगे, लेकिन उसका प्रभाव व्यक्ति के सामाजिक, आर्थिक और नागरिक जीवन पर पड़ता है। ऐसे में इसे पूरी तरह धार्मिक मामला मानकर अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षण नहीं दिया जा सकता।

    रामचंद्रन ने अदालत को बताया कि बहिष्कार के कारण कई बार विवाह टूट जाते हैं, परिवार बिखर जाते हैं, सामाजिक संस्थाओं से बाहर कर दिया जाता है और यहां तक कि कब्रिस्तानों में प्रवेश तक रोक दिया जाता है। इसलिए अदालत को ऐसी प्रथाओं के वास्तविक सामाजिक प्रभाव को देखना होगा।

    उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक संप्रदायों को अनुशासन बनाए रखने का अधिकार है, लेकिन वह किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों — विशेष रूप से गरिमा, स्वतंत्रता और समानता — को खत्म नहीं कर सकता।

    अनुच्छेद 25 और 26 के संबंध पर दलील देते हुए रामचंद्रन ने कहा कि अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संप्रदायों के अधिकार, अनुच्छेद 25 में दिए गए व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार से ऊपर नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान “individual-centric” यानी व्यक्ति-केंद्रित है और अदालत को किसी भी स्थिति में संप्रदायगत अधिकारों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर प्राथमिकता नहीं देनी चाहिए।

    सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने पूछा कि क्या constitutional morality को अन्य संवैधानिक मूल्यों से ऊपर रखा जा सकता है और क्या इसका इस्तेमाल कानून रद्द करने के लिए किया जा सकता है। इस पर रामचंद्रन ने कहा कि constitutional morality कोई स्वतंत्र परीक्षण नहीं, बल्कि मौलिक अधिकारों की व्याख्या में सहायता करने वाला सिद्धांत है।

    सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने सवाल उठाया कि क्या बहिष्कार वास्तव में धार्मिक प्रथा है या एक सामाजिक प्रथा। अदालत ने 1962 के सैयदना ताहेर सैफुद्दीन मामले के फैसले और उसकी चुनौती की देरी पर भी सवाल किए।

    इस पर रामचंद्रन ने कहा कि बहिष्कार का डर इतना गहरा होता है कि लोग अदालत तक जाने से भी डरते हैं और कई पीढ़ियों तक इस प्रथा का प्रभाव बना रहता है।

    मामले की सुनवाई संविधान पीठ के समक्ष जारी है।

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