S. 319 CrPC | अतिरिक्त आरोपी को समन करने से पहले क्रॉस-एग्जामिनेशन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
27 Oct 2026 3:18 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने CrPC की धारा 319 (अब BNSS की धारा 358) के तहत महिला को अतिरिक्त आरोपी बनाए जाने का आदेश रद्द किया। कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने उस गवाह की जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) पर ध्यान नहीं दिया, जिसके बयान के आधार पर उस महिला को आरोपी के तौर पर समन किया गया।
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने जोर देकर कहा कि किसी अतिरिक्त आरोपी को समन करने से पहले गवाह के पूरे बयान पर विचार किया जाना चाहिए। ऐसा तब और भी जरूरी हो जाता है, जब जिरह के दौरान दिए गए बयान उस मुख्य गवाही (एग्जामिनेशन-इन-चीफ) की नींव को ही कमजोर कर देते हैं, जिसके आधार पर आरोपी बनाने का आदेश दिया गया।
कोर्ट ने कहा,
"...जहां गवाह से जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) की गई हो, वहां ट्रायल कोर्ट पूरे बयान को अनदेखा नहीं कर सकता। साक्ष्य (सबूत) केवल गवाह का मुख्य बयान ही नहीं होता, बल्कि इसमें जिरह के दौरान दर्ज किया गया बयान भी शामिल होता है। बेशक, ट्रायल कोर्ट को यह तय करने के लिए कि किसी अतिरिक्त आरोपी पर पहले से मुकदमा झेल रहे व्यक्ति के साथ मुकदमा चलाना सही होगा या नहीं, गवाह के बयान को संभावनाओं की कसौटी पर या अन्य सबूतों के वजन के साथ तौलने की जरूरत नहीं है। हालांकि, अगर जिरह के दौरान गवाह का बयान उसके मुख्य बयान की पूरी बुनियाद को ही ढहा देता है तो ट्रायल कोर्ट उस बयान को पूरी तरह से नजरअंदाज नहीं कर सकता—खासकर तब, जब किसी अतिरिक्त आरोपी को आरोपी बनाने का फैसला पूरी तरह से उसी गवाह के बयान पर टिका हो। हालांकि, पूरे बयान पर विचार करने के बाद यह ट्रायल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में होगा कि वह अतिरिक्त आरोपी को पहले से मुकदमा झेल रहे व्यक्ति के साथ मुकदमा चलाने के लिए आरोपी बनाए या नहीं।"
अपीलकर्ता को एक हत्या के मामले में CrPC की धारा 319 के तहत अतिरिक्त आरोपी बनाया गया, जो गवाहों (PW 1, 2 और 3) की गवाही पर आधारित था। अपने खिलाफ इस आदेश को चुनौती देते हुए उसने तर्क दिया कि गवाह 2 और 3 अपने बयानों से मुकर गए (होस्टाइल हो गए)। साथ ही कोर्ट ने गवाह 1 के केवल मुख्य बयान (एग्जामिनेशन-इन-चीफ) पर भरोसा किया, जबकि उसकी जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) को नजरअंदाज किया। इस जिरह ने उसकी उस शुरुआती गवाही को कमजोर की, जिसके आधार पर महिला को अतिरिक्त आरोपी के तौर पर समन किया गया। अपने खिलाफ आरोप तय किए जाने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका को हाईकोर्ट द्वारा खारिज किए जाने से व्यथित होकर आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए कहा कि निचली अदालतों ने PW1 (अभियोजन पक्ष के पहले गवाह) के जिरह (Cross-Examination) के बयानों को नजरअंदाज करके गलती की है, जबकि इन बयानों ने उसके मुख्य बयानों की विश्वसनीयता को ही हिला दिया। कोर्ट के अनुसार, धारा 319 के तहत किसी अतिरिक्त आरोपी को तलब करने की अर्जी पर फैसला लेते समय, यदि जिरह के दौरान कोई बयान दिए गए हैं, तो उन पर भी उचित ध्यान दिया जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा,
"चूंकि हमें लगता है कि न तो हाईकोर्ट और न ही ट्रायल कोर्ट ने गवाहों, विशेषकर PW1 के बयानों पर पूरी तरह से गौर किया, और जिरह के दौरान PW1 द्वारा दिए गए बयानों को अनदेखा किया, इसलिए हमारी राय में ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों के आदेशों को रद्द किया जाना चाहिए। हालांकि, ट्रायल कोर्ट के पास यह छूट होगी कि वह अतिरिक्त आरोपी को शामिल करने की मांग पर कानून के अनुसार नए सिरे से विचार कर सके।"
परिणामस्वरूप, अपील स्वीकार की गई।
Case Title : NEELAM YADAV VERSUS STATE OF U.P. & ANR.

