S. 313 CrPC | आरोपी के बयान का इस्तेमाल हालात की अधूरी कड़ी को पूरा करने के लिए नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
2 Oct 2026 9:37 AM IST

अपनी छह साल की भांजी के रेप और मर्डर के आरोप में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (1 अक्टूबर) को कहा कि अगर अभियोजन पक्ष आरोपी का अपराध बिना किसी शक के साबित करने में नाकाम रहता है तो सिर्फ़ CrPC की धारा 313 / BNSS की धारा 351 के तहत बचाव पक्ष के बयानों के आधार पर उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
दूसरे शब्दों में, CrPC की धारा 313 के तहत पूछे गए सवालों के जवाब में आरोपी ने जो कहा, उसका इस्तेमाल अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में रह गई कमियों को पूरा करने के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जब आरोपी अपने खिलाफ मिले सबूतों के बारे में कोई सफाई नहीं दे पाता, तभी उसके खिलाफ़ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला जा सकता है।
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने एक नाबालिग लड़की के रेप और मर्डर के कथित अपराध में उम्रकैद की सज़ा पाए व्यक्ति की सज़ा रद्द की। बेंच ने पाया कि आरोपी को दोषी ठहराने का आधार CrPC की धारा 313 के तहत उसके जवाब थे, जबकि अन्य परिस्थितिजन्य सबूत उसका अपराध बिना किसी शक के साबित करने के लिए नाकाफ़ी हैं।
कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ यह पता चलना कि अभियोजन पक्ष के सवालों के जवाब में आरोपी ने... अगर जवाब संतोषजनक नहीं हैं तो इसे धारा 313 के तहत आरोपी द्वारा कोई स्पष्टीकरण न देने या विफलता के तौर पर नहीं देखा जाएगा।
कोर्ट ने 'राज कुमार सिंह उर्फ राजू उर्फ बाट्या बनाम राजस्थान राज्य (2013 INSC 313)' मामले का हवाला देते हुए कहा,
"...जब यह पाया जाता है कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश की गई परिस्थितियों की कड़ी पूरी नहीं है। उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता तो धारा 313 के तहत दर्ज अपीलकर्ता का बयान उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं माना जा सकता; खासकर तब, जब अन्य परिस्थितिजन्य सबूत भी संतोषजनक न हों और केवल अपीलकर्ता के ही दोषी होने की ओर इशारा न करते हों।"
कोर्ट ने यह पाया कि आरोपी ने अपने खिलाफ किसी भी दोषी ठहराने वाली परिस्थिति के बारे में स्पष्टीकरण देने में कोई चूक नहीं की है। इसलिए कोर्ट ने कहा कि धारा 313 के बयान का इस्तेमाल एक अतिरिक्त कड़ी के तौर पर नहीं किया जा सकता, क्योंकि अभियोजन पक्ष के स्वतंत्र सबूतों से परिस्थितियों की वह कड़ी कभी स्थापित ही नहीं हो पाई।
कोर्ट ने कहा,
"...हमें ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि उसने अपने खिलाफ किसी दोषी ठहराने वाली परिस्थिति के बारे में स्पष्टीकरण देने में कोई चूक की हो। यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि परिस्थितिजन्य सबूतों पर आधारित मामले में, जब आरोपी पर स्पष्टीकरण देने की ज़िम्मेदारी हो और वह कोई उचित स्पष्टीकरण न दे पाए, तभी उस बात को उसके खिलाफ साबित हुई परिस्थितियों की कड़ी में अतिरिक्त कड़ी माना जा सकता है। इस प्रकार, अपीलकर्ता की चुप्पी या उचित स्पष्टीकरण न दे पाना केवल अतिरिक्त कड़ी के तौर पर काम कर सकता है, जो उस कड़ी को पूरा कर दे।"
ऊपर बताई गई बातों के अलावा, कई अन्य कारणों ने भी अपीलकर्ता को बरी करने के कोर्ट के फैसले में भूमिका निभाई, जैसे कि 'लास्ट सीन थ्योरी' (आखिरी बार देखे जाने की थ्योरी) का साबित न हो पाना, DNA और FSL रिपोर्ट का निर्णायक न होना और एविडेंस एक्ट की धारा 27 के तहत बरामदगी से जुड़े सबूतों का अप्रासंगिक होना।
कोर्ट ने आगे कहा,
“हमें लगता है कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए सबूत अपीलकर्ता के दोषी होने को साबित करने के लिए काफी नहीं हैं। जिन गवाहों से पूछताछ की गई, उन्हें इस बात पर पक्का यकीन नहीं था कि अपीलकर्ता को आखिरी बार पीड़ित के साथ देखा गया, क्योंकि उन्हें इस बारे में खुद शक था। 1872 के कानून की धारा 27 के तहत जो चीज़ बरामद की गई, वह ऐसी जगह से मिली जो आम तौर पर दूसरों को दिखाई देती है, इसलिए ऐसी बरामदगी पर सावधानी से विचार करने की ज़रूरत है। DNA रिपोर्ट में साफ़ तौर पर कहा गया है कि हड्डियों के अंश पुरुष के हैं, जबकि पीड़ित महिला है। ज़ाहिर है, वे हड्डियाँ पीड़ित की माँ और बहन के खून के नमूनों से मेल नहीं खातीं। FSL की रिपोर्ट भी अभियोजन पक्ष के मामले को आगे नहीं बढ़ाती। इस बात पर भी शक पैदा होता है कि क्या भूरे रंग का शॉल, जिसके बारे में अभियोजन पक्ष का दावा है कि अपीलकर्ता उसे अपनी माँ के पास से लाया था, वही शॉल था; क्योंकि अपीलकर्ता की माँ ने कहा कि वह शॉल उनका नहीं है।
इसलिए कोड की धारा 313 के तहत अपील करने वाले के बयान को हालात की कड़ी में एक अतिरिक्त कड़ी नहीं माना जा सकता। दूसरे शब्दों में, हालात की कड़ी अभियोजन पक्ष के सबूतों के आधार पर नहीं बनी है। हमारी राय में, सेशंस कोर्ट उन अहम बातों पर ध्यान देने में नाकाम रहा जो रिकॉर्ड पर मौजूद थीं। इसलिए, हालात से जुड़े सबूतों के आधार पर अपील करने वाले को दोषी ठहराने में उससे गलती हुई। हाई कोर्ट भी अभियोजन पक्ष के मामले में इन सभी कमियों पर ध्यान देने में नाकाम रहा। अपील करने वाले का अपराध बिना किसी शक के साबित नहीं हुआ। अभियोजन पक्ष के सबूतों को देखते हुए अपराध में उसकी भूमिका को लेकर गहरा शक पैदा होता है। यह भी सच है कि पीड़ित की दुखद मौत हुई। हालांकि, रिकॉर्ड पर मौजूद ऐसी सामग्री के आधार पर उसे दोषी ठहराना शायद ही सही होगा, जबकि कोई भी हालात उसकी भूमिका की ओर इशारा नहीं करते। ऐसे हालात में, उसे शक का फ़ायदा दिया जाना चाहिए।”
नतीजतन, अपील मंज़ूर की गई।
Case Title : SANTOSH GURUNG VERSUS STATE OF SIKKIM

