महाराष्ट्र में बाकी स्थानीय निकाय चुनाव 50% आरक्षण की सीमा का उल्लंघन किए बिना कराए जा सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
22 July 2026 10:07 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि महाराष्ट्र राज्य में 20 ज़िला परिषदों और 211 पंचायत समितियों के चुनाव, जो अभी होने बाकी हैं, 50 प्रतिशत की आरक्षण सीमा का उल्लंघन किए बिना कराए जा सकते हैं।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच महाराष्ट्र स्थानीय निकाय चुनावों से जुड़ी कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। ये चुनाव अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण से जुड़े मुद्दों के कारण 2022 से 2025 के बीच रुके हुए थे।
मई 2025 में कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश पारित किया, जिससे राज्य में स्थानीय निकाय चुनाव कराने का रास्ता साफ हो गया। हालांकि, बाद में कोर्ट के सामने कुछ आवेदन दायर किए गए, जिनमें तर्क दिया गया कि कुछ स्थानीय निकायों के मामले में 50% आरक्षण की सीमा (जिसके बारे में के. कृष्ण मूर्ति मामले में संविधान पीठ ने बात की थी) का उल्लंघन किया गया। इसके बाद कोर्ट ने कहा कि महाराष्ट्र के अधिकारियों ने उसके 2025 के आदेश का गलत अर्थ निकाला और 50% की सीमा का उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए था।
मंगलवार को शुरुआत में सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह और गोपाल शंकरनारायणन ने मामले से जुड़े मुद्दों की संक्षिप्त रूपरेखा पेश की। जयसिंह ने विशेष रूप से इस बात पर ज़ोर दिया कि जिन ज़िलों में अनुसूचित जनजातियों की आबादी ज़्यादा है, वहां 50% आरक्षण सीमा का उल्लंघन हुआ है। उन्होंने आगे तर्क दिया कि कोर्ट को उन मानदंडों पर विचार करने की ज़रूरत है जिनके आधार पर OBC को आरक्षण दिया जा सकता है।
जयसिंह ने कहा,
"मुख्य मुद्दे की बात करें तो - हमारा सरोकार कृष्णमूर्ति फ़ैसले की व्याख्या से है। कोर्ट का मानना है कि कुल आरक्षण 50% से ज़्यादा नहीं हो सकता। हमारा कहना है कि राजनीतिक आरक्षण का मामला अलग है। इसलिए यह सीमा राजनीतिक आरक्षण पर लागू नहीं होगी। आबादी के अनुपात का नियम OBC पर भी लागू होगा... इससे सीमा पार हो सकती है... हो यह रहा कि STs पूरा कोटा ले रहे हैं... उन निर्वाचन क्षेत्रों में OBC के लिए कोई आरक्षित सीट नहीं है। क्या आप शून्य आरक्षण दे सकते हैं? यही मुद्दा है। सुझाव यह है कि - बाकी परिषदों के चुनाव पूरे होने दिए जाएं। अभी हमें 0 आरक्षण मिल रहा है। जहां चुनाव हुए हैं, वहां शेड्यूल 5 इलाकों में 50% की सीमा पार हो गई।"
उन्होंने कोर्ट से यह भी आग्रह किया कि राज्य से उन ज़िलों का डेटा मांगा जाए, जहां 50% की सीमा पार हो गई। यह भी तर्क दिया गया कि कृष्णमूर्ति फ़ैसले के अनुसार भी, खास मामलों में आरक्षण 50% की सीमा से ज़्यादा हो सकता है।
कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई करने का प्रस्ताव रखा, लेकिन बार की तरफ़ से कहा गया कि महाराष्ट्र में ज़्यादातर स्थानीय निकायों के चुनाव हो चुके हैं। वकील ने बताया कि सिर्फ़ 20 ज़िला परिषद और 211 पंचायत समितियां बची हैं, जिनके चुनाव उसी शर्त के साथ कराए जा सकते हैं (कि 50% आरक्षण की सीमा पार न हो)।
पक्षों की बात सुनने के बाद कोर्ट ने चुनाव कराने की अनुमति देने का प्रस्ताव रखा (जो कार्यवाही के अंतिम नतीजे पर निर्भर करेगा)।
CJI कांत ने कहा,
"हमारा मुद्दा साफ़ है... हमने कहा कि आप 50% से ज़्यादा न करें... बाकी मामलों में, अगर आप सब सहमत हैं कि वही नियम अपनाए जा सकते हैं, तो हमें कोई दिक्कत नहीं है।"
हालांकि, राज्य चुनाव आयोग की ओर से सीनियर एडवोकेट बलबीर सिंह ने बताया कि महाराष्ट्र में 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (SIR) की प्रक्रिया चल रही है और इसके साथ स्थानीय निकाय चुनाव कराना मुश्किल होगा।
उन्होंने कहा,
"पूरा स्टाफ़ SIR में लगा हुआ है। उसे रोककर इसमें लगना... मुश्किल होगा। RP Act के तहत ECI ने पहले ही सभी अधिकारियों को नोटिफ़ाई कर दिया। ECI को आगे आकर बताना होगा कि क्या वह अधिकारी उपलब्ध करा सकता है।"
इसके जवाब में बेंच ने कहा कि स्थानीय निकाय चुनाव ECI (जो SIR करवा रहा है) द्वारा कराए जाने ज़रूरी नहीं हैं। इसलिए लॉजिस्टिकल सपोर्ट का मुद्दा ECI के सामने उठाना राज्य चुनाव आयोग (SEC) की ज़िम्मेदारी थी।
साथ ही कोर्ट ने भरोसा दिलाया कि अगर ज़रूरत पड़ी, तो वह राज्य में चुनाव कराने के लिए पर्याप्त मैनपावर और लॉजिस्टिकल सपोर्ट पक्का करेगा। इस मामले को शुक्रवार के लिए लिस्ट किया गया और पार्टियों से कहा गया कि वे उन औपचारिक मुद्दों का सुझाव दें, जिन पर कोर्ट को विचार करना है। SEC से कहा गया कि वह पर्याप्त लॉजिस्टिकल सपोर्ट के प्रावधान के बारे में निर्देश ले और अगस्त-सितंबर में चुनाव कराने के लिए एक चुनावी कार्यक्रम तैयार करे।
संक्षेप में मामला
कुछ याचिकाओं में महाराष्ट्र राज्य में ज़िला परिषदों और पंचायत समितियों के चुनाव न कराए जाने को चुनौती दी गई। आरोप है कि ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि आरक्षण 50% की उस अधिकतम सीमा से ज़्यादा हो गया, जिसे कोर्ट ने 'के. कृष्णा मूर्ति बनाम भारत संघ' और 'विकास किशनराव गवली बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामलों में तय किया।
गवली मामले (2021) में सुप्रीम कोर्ट ने 'महाराष्ट्र ज़िला परिषद और पंचायत समिति अधिनियम, 1961' के तहत दिए गए 27% OBC आरक्षण को रद्द कर दिया था, क्योंकि इससे 50% की सीमा का उल्लंघन हो रहा था।
2022 में कोर्ट ने महाराष्ट्र के स्थानीय चुनावों में OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) आरक्षण के मामले में यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया। इसका मतलब था कि जिन 367 स्थानीय निकायों में चुनाव प्रक्रिया की घोषणा पहले ही हो चुकी थी, वहाँ फिलहाल OBC कोटा लागू नहीं किया जा सकता।
मई 2025 में कोर्ट ने राज्य में स्थानीय निकाय चुनाव (जो 2022 से टले हुए थे) कराने का अंतरिम आदेश दिया। निर्देश दिया गया कि चुनाव उसी OBC आरक्षण व्यवस्था के तहत कराए जाएं, जो जुलाई 2022 में बंथिया आयोग की रिपोर्ट सौंपे जाने से पहले लागू थी। जस्टिस सूर्यकांत (अब CJI) की अध्यक्षता वाली बेंच ने राज्य चुनाव आयोग को चार हफ़्ते के भीतर स्थानीय निकाय चुनावों की घोषणा करने का निर्देश दिया।
आदेश दिया गया कि चुनाव प्रक्रिया को चार महीने के भीतर पूरा करने की कोशिश की जाए। चुनाव आयोग को ज़रूरत पड़ने पर समय बढ़ाने की छूट दी गई।
नवंबर 2025 में, कोर्ट के सामने ऐसी अर्जियाँ आईं जिनमें दावा किया गया कि कुछ स्थानीय निकायों में आरक्षण 50% की सीमा से ज़्यादा हो रहा था। कोर्ट ने कहा कि कुल आरक्षण 50% की अधिकतम सीमा से ज़्यादा नहीं हो सकता और राज्य अधिकारियों ने शायद मई के आदेश का गलत मतलब निकाला था। अधिकारियों से कहा गया कि वे 50% से ज़्यादा आरक्षण लागू न करें। उनसे यह भी बताने को कहा गया कि कितनी नगर पालिकाओं में 50% की सीमा पार हो गई।
बाद में राज्य में कुछ स्थानीय निकायों के चुनाव कराए गए। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक और याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव तुरंत कराने की माँग की गई और कहा गया कि 50% से ज़्यादा आरक्षित सीटों को 'ओपन सीट' (सामान्य सीट) माना जाए।
Case Title: RAHUL RAMESH WAGH v. THE STATE OF MAHARASHTRA AND ORS., SLP(C) No. 19756/2021 (and connected cases)


