कोई नुकसान न होने पर गिरफ्तारी के आधार बताने में प्रक्रियात्मक कमी होने पर भी आरोपी को जमानत नहीं मिलेगी: सुप्रीम कोर्ट

  • कोई नुकसान न होने पर गिरफ्तारी के आधार बताने में प्रक्रियात्मक कमी होने पर भी आरोपी को जमानत नहीं मिलेगी: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (28 अक्टूबर) को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों के लिए जासूसी करने के आरोपी एक व्यक्ति की जमानत रद्द की। कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी के आधार बताने में अगर कोई प्रक्रियात्मक चूक हुई भी है तो भी इससे आरोपी को अपने बचाव का मौका न मिलने जैसा कोई नुकसान नहीं हुआ, इसलिए केवल इस आधार पर उसे जमानत नहीं दी जा सकती।

    जस्टिस एम.एम. सुंदेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने राजस्थान हाईकोर्ट का वह आदेश रद्द किया, जिसमें आरोपी को जमानत दी गई। आरोपी पर 'ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट' (Official Secrets Act) के तहत आरोप था कि उसने पैसे के बदले पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों को सेना की संवेदनशील तस्वीरें, वीडियो और सैनिकों की आवाजाही की जानकारी भेजी थी।

    हाईकोर्ट ने इस आधार पर जमानत दी थी कि आरोपी को गिरफ्तारी के लिखित कारण नहीं दिए गए। इसके लिए हाईकोर्ट ने 'मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य' (2025 LiveLaw (SC) 1066) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया।

    हाईकोर्ट के नजरिए से अलग राय रखते हुए जस्टिस वराले ने अपने फैसले में कहा कि रिकॉर्ड से साफ है कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) और 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' (BNSS), 2023 की धारा 47 का पूरी तरह से पालन किया गया।

    औपचारिक गिरफ्तारी से पहले, 'ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट' (OSA), 1923 की धारा 8(1) के तहत आरोपी को कानूनी नोटिस दिया गया, जिसमें उसे चल रही जांच के बारे में सूचित किया गया। गिरफ्तारी के तुरंत बाद आरोपी को इसके कारण बता दिए गए और केस डायरी में भी इसे दर्ज किया गया।

    कोर्ट ने पाया कि गिरफ्तारी मेमो में आरोपी के खिलाफ लगे आरोपों का पूरा विवरण था और उस पर आरोपी के हस्ताक्षर भी थे। उसे गिरफ्तारी के कारणों के बारे में बता दिया गया। उसके भाई को भी इस बारे में सूचित कर दिया गया। इसके अलावा, रिमांड की कार्यवाही के दौरान आरोपी की ओर से एक वकील मौजूद था, लेकिन गिरफ्तारी के आधार न बताए जाने को लेकर कोई आपत्ति नहीं जताई गई।

    अदालत के अनुसार,

    "गिरफ्तारी के आधार बताने के तरीके या रूप को लेकर उठाई गई कोई बहुत ही तकनीकी आपत्ति, नियमित जमानत (रेगुलर बेल) पाने का एक ऐसा 'स्वचालित' या 'पक्का' जरिया नहीं बन सकती, जो जमानत से जुड़े मुख्य कानूनी पैमानों को ही दरकिनार कर दे।"

    यह देखते हुए कि आरोपी को अपनी गिरफ्तारी के कारणों की पूरी जानकारी थी और रिमांड के चरण में वकील ने उसका पक्ष प्रभावी ढंग से रखा था, अदालत ने कहा,

    "इस तरह अनुच्छेद 22(1) का मूल उद्देश्य सार्थक रूप से पूरा हो गया, और आरोपी को इससे कोई वास्तविक नुकसान (Prejudice) नहीं हुआ।"

    'स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम श्री दर्शन' और 'कासीरेड्डी उपेंदर रेड्डी बनाम स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश' मामलों का हवाला देते हुए अदालत ने दोहराया कि प्रक्रिया में किसी कथित कमी की जांच इस आधार पर होनी चाहिए कि क्या इससे आरोपी को कोई वास्तविक नुकसान हुआ है। अदालत ने माना कि गिरफ्तारी के आधार बताने की अनिवार्यता का मतलब यह नहीं है कि हर स्थिति में लिखित रूप में ही जानकारी देना एक अनिवार्य औपचारिकता हो।

    परिणामस्वरूप, अपील स्वीकार की गई।

    Case Title : STATE OF RAJASTHAN VERSUS JHABRA RAM

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