यह अनुमान कि पति विवाह के दौरान पैदा हुए बच्चे का पिता है, विस्थापित नहीं, भले ही पत्नी के किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंध हों: सुप्रीम कोर्ट

  • यह अनुमान कि पति विवाह के दौरान पैदा हुए बच्चे का पिता है, विस्थापित नहीं, भले ही पत्नी के किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंध हों: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने इस बात की पुष्टि की कि बच्चे की वैधता पितृत्व निर्धारित करती है, इस बात पर जोर देते हुए कि वैध विवाह के दौरान पैदा हुए बच्चे को उन माता-पिता की वैध संतान माना जाता है, जिनकी गर्भाधान के समय एक-दूसरे से पहुंच थी।

    कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि वैधता और पितृत्व अलग-अलग अवधारणाएं हैं, जिनके लिए अलग-अलग निर्धारण की आवश्यकता होती है। इसने माना कि वैधता और पितृत्व स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, क्योंकि बच्चे की वैधता सीधे पितृत्व को स्थापित करती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि यह साबित हो जाता है कि बच्चे के गर्भाधान के समय विवाहित जोड़े की एक-दूसरे से पहुंच थी, तो बच्चे को वैध माना जाता है, जिससे जोड़े का पितृत्व स्थापित होता है।

    न्यायालय ने कहा,

    "प्रावधान (साक्ष्य अधिनियम की धारा 112) की भाषा यह स्पष्ट रूप से स्पष्ट करती है कि इस बात की प्रबल धारणा है कि पति अपनी पत्नी द्वारा अपने विवाह के दौरान जन्म लिए गए बच्चे का पिता है। यह धारा यह प्रावधान करती है कि वैधता का निर्णायक प्रमाण पितृत्व के बराबर है। इस सिद्धांत का उद्देश्य बच्चे के माता-पिता के बारे में किसी भी अनुचित जांच को रोकना है। चूंकि यह धारणा वैधता के पक्ष में है, इसलिए 'अवैधता' का दावा करने वाले व्यक्ति पर इसे केवल 'गैर-पहुंच' के माध्यम से साबित करने का भार डाला जाता है।"

    जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुयान की खंडपीठ ने ऐसे मामले की सुनवाई की, जिसमें प्रतिवादी और उसकी मां ने अपीलकर्ता को अपना जैविक पिता होने का दावा किया, जबकि प्रतिवादी का जन्म उसकी मां के दूसरे व्यक्ति (आरके) से विवाह के दौरान हुआ था। प्रतिवादी ने पितृत्व घोषणा की मांग करते हुए सिविल मुकदमा दायर किया, लेकिन इसे खारिज कर दिया गया, जिसमें भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 112 के तहत वैधता की धारणा को बरकरार रखा गया, जो आरके के पक्ष में था।

    धारा 112 के तहत वैधता की धारणा को बरकरार रखने वाले कई न्यायालयों द्वारा समवर्ती निष्कर्ष के बावजूद, फैमिली कोर्ट ने प्रतिवादी द्वारा अपीलकर्ता के खिलाफ दायर धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण याचिका को पुनर्जीवित किया, जिसे पहले रोक दिया गया था।

    उसके खिलाफ धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण याचिका को पुनर्जीवित करने के लिए हाईकोर्ट द्वारा अनुमोदन के बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

    सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण याचिका उसके खिलाफ़ बनाए रखने योग्य नहीं मानी जा सकती, क्योंकि उसने कभी प्रतिवादी की माँ के साथ सहवास नहीं किया और प्रतिवादी के गर्भाधान के दौरान उसकी माँ तक पहुंच नहीं थी। उन्होंने आगे तर्क दिया कि उनका DNA Test नहीं किया जा सकता, क्योंकि DNA Test की अनुमति केवल तभी दी जाती है, जब पति-पत्नी के बीच गैर-पहुंच साबित करने वाला एक मजबूत प्रथम दृष्टया मामला बनता है। चूंकि प्रतिवादी की मां और आरके के पास प्रतिवादी के गर्भाधान के समय एक-दूसरे तक पूरी पहुंच थी, इसलिए उसे DNA Test से गुजरने के लिए मजबूर करना उसकी निजता के अधिकार का उल्लंघन होगा।

    इसके विपरीत, प्रतिवादी ने तर्क दिया कि वैधता और पितृत्व अलग-अलग अवधारणाएं हैं, जहां बच्चे की वैधता का प्रमाण पति-पत्नी के पितृत्व को साबित नहीं कर सकता।

    दोनों पक्षकारों को विस्तार से सुनने के बाद जस्टिस कांत द्वारा लिखे गए फैसले ने प्रतिवादी के इस तर्क को खारिज कर दिया कि पितृत्व और वैधता अलग-अलग अवधारणाएं हैं। न्यायालय ने कहा कि एक बार यह साबित हो जाने पर कि बच्चा वैध विवाह के अस्तित्व के दौरान विवाह से बाहर पैदा हुआ है, तब बच्चे को साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत वैध बच्चा माना जाता है और बच्चे के माता-पिता उसका पितृत्व प्राप्त करते हैं।

    न्यायालय ने इस कानूनी सिद्धांत पर जोर दिया कि वैधता पितृत्व को मानती है, जब तक कि पति-पत्नी के बीच गैर-पहुंच साबित करके निर्णायक रूप से खंडन न किया जाए। केवल व्यभिचार या एक साथ पहुंच के आरोप अनुमान को खारिज करने के लिए अपर्याप्त हैं। न्यायालय ने फैसला सुनाया कि भले ही अपीलकर्ता और आरके दोनों की प्रतिवादी की मां तक ​​एक साथ पहुंच हो, लेकिन जब आरके और प्रतिवादी की मां के बीच पहुंच साबित हो जाती है तो अपीलकर्ता को प्रतिवादी के जैविक पिता के रूप में स्थापित करना पर्याप्त नहीं होगा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वैधता की धारणा को केवल गैर-पहुंच साबित करके ही खारिज किया जा सकता है, जो पति-पत्नी के वैवाहिक संबंध बनाने की असंभवता - न कि केवल अक्षमता - को दर्शाता है।

    अदालत ने कहा,

    “इस मामले में यह स्वीकृत तथ्य है कि जब प्रतिवादी का 2001 में जन्म हुआ था, तब उसकी माँ और आरके विवाहित थे। वास्तव में वे 1989 से विवाहित थे और दोनों ने कभी भी विवाह की वैधता पर सवाल नहीं उठाया। वे बेशक 1989 से 2003 तक एक ही छत के नीचे रह रहे थे, जब उन्होंने अलग होने का फैसला किया। यह स्पष्ट है कि प्रतिवादी की माँ और मिस्टर आरके की अपनी शादी के दौरान एक-दूसरे तक पहुंच थी। मुकदमेबाजी के कई चरणों में शामिल सभी अदालतों के समवर्ती निष्कर्षों के माध्यम से यह निष्कर्ष निकाला गया। भले ही यह मान लिया जाए कि प्रतिवादी की माँ ने अपनी शादी के दौरान और विशेष रूप से जब प्रतिवादी का जन्म हुआ, तब अपीलकर्ता के साथ संबंध थे, ऐसा तथ्य अपने आप में वैधता की धारणा को खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। एकमात्र चीज जिस पर ऐसा आरोप प्रकाश डालता है, वह यह तथ्य है कि प्रतिवादी की माँ के साथ अपीलकर्ता और मिस्टर आरके की एक साथ पहुंच थी। हालांकि, यह स्पष्ट करने की आवश्यकता है कि 'अतिरिक्त' पहुंच या 'एकाधिक' पहुंच स्वचालित रूप से पति-पत्नी के बीच पहुंच को नकारती नहीं है। यह साबित नहीं करती कि दोनों के बीच कोई पहुंच नहीं है। नतीजतन, एक वैधानिक आदेश है कि प्रतिवादी को आरके का बेटा माना जाना चाहिए।"

    अदालत ने आगे कहा,

    "हमारी सुविचारित राय में हाईकोर्ट के समक्ष उठाई गई चुनौती कि 'पितृत्व' और 'वैधता' अलग-अलग या स्वतंत्र अवधारणाएं हैं, एक गलत धारणा है। इसे खारिज किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट का यह विचार कि 'पितृत्व' बच्चे की वैधता के बारे में समवर्ती निष्कर्षों से स्वतंत्र रूप से निर्धारित किया जा सकता है, कायम नहीं रखा जा सकता है।"

    तदनुसार, अपील को अनुमति दी गई।

    केस टाइटल: इवान रथिनम बनाम मिलन जोसेफ

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