PC Act | बिचौलिये को रिश्वत देना सरकारी कर्मचारी का अपराध साबित करने के लिए काफ़ी नहीं: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
17 Sept 2026 11:55 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (16 सितंबर) को कहा कि सिर्फ़ यह साबित हो जाने से कि शिकायतकर्ता और बिचौलिये (जिसने किसी सरकारी कर्मचारी का नाम लिया था) के बीच पैसों का लेन-देन हुआ, यह साबित नहीं होता कि उस सरकारी कर्मचारी ने रिश्वत ली है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने भ्रष्टाचार के मामले में पूर्व रेलवे सुरक्षा बल (RPF) अधिकारी भरत राज मीणा को बरी करते हुए यह टिप्पणी की। अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि अपीलकर्ता ने बिचौलिये के ज़रिए गैर-कानूनी तौर पर पैसे की मांग की, या उसे स्वीकार किया [देखें नीरज दत्ता बनाम राज्य (NCT दिल्ली सरकार) 2022 LiveLaw (SC) 1029]।
यह मामला CBI के ट्रैप से जुड़ा है, जिसमें RPF कर्मचारी पी.पी. नंदकुमार ने आरोप लगाया कि पोस्टिंग पाने के लिए ₹10,000 की मांग की गई। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आरोपी मीणा ने कॉन्स्टेबल अनंत नारायणन के ज़रिए पैसे की मांग की। बाद में कॉन्स्टेबल को रिश्वत के पैसे लेते हुए पकड़ा गया।
ट्रायल कोर्ट द्वारा 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' की धारा 7 और 13(2) के साथ धारा 13(1)(a) के तहत सुनाई गई सज़ा को केरल हाईकोर्ट द्वारा बरकरार रखने के फ़ैसले से नाराज़ होकर आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
सज़ा रद्द करते हुए जस्टिस कोटिश्वर सिंह द्वारा लिखे गए फ़ैसले में कहा गया कि आरोपी की ओर से किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा रिश्वत के पैसे लेना, अपने आप में यह साबित नहीं करता कि आरोपी ने रिश्वत ली है।
कोर्ट ने गौर किया कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि बिचौलिये को मिले पैसे अंततः अपीलकर्ता तक पहुंचने वाले थे या वास्तव में अपीलकर्ता तक पहुँचे थे।
कोर्ट ने R.P.S. यादव बनाम CBI मामले में 2015 के अपने फ़ैसले का हवाला देते हुए यह बात कही,
“सिर्फ़ पैसे की मांग करना और उसे किसी बीच के व्यक्ति को सौंपना काफ़ी नहीं है; ठोस सबूतों के ज़रिए इस पूरी कड़ी को उस बिंदु तक साबित करना ज़रूरी है, जहां यह दिखे कि पैसा असल में आरोपी तक पहुंचा या उसे आरोपी के लिए ही दिया गया। ऐसा न होने पर सज़ा बरकरार नहीं रखी जा सकती।”
कोर्ट ने कहा,
“इसलिए ऊपर बताई गई वजहों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि अभियोजन पक्ष ने अपीलकर्ता के ख़िलाफ़ मामला 'उचित संदेह से परे' (Beyond Reasonable Doubt) साबित किया, इसलिए अपीलकर्ता की सज़ा... बरकरार नहीं रखी जा सकती।”
इसके अनुसार, कोर्ट ने अपील मंज़ूर की।
कोर्ट ने कहा,
“इसलिए हमारा मानना है कि ऊपर चर्चा किए गए उचित संदेहों को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि अपीलकर्ता के ख़िलाफ़ आरोप 'उचित संदेह से परे साबित होने' के सिद्धांत के तहत पूरी निश्चितता के साथ साबित हुए हैं। इसलिए PW-11 N.P. गोपी कुमार से जुड़े लेन-देन के मामले में अपीलकर्ता की सज़ा को एक्ट की धारा 7 के तहत बरकरार नहीं रखा जा सकता, और अपीलकर्ता इस लेन-देन में भी बरी किए जाने का हकदार है।”
Cause Title: BHARAT RAJ MEENA VERSUS CENTRAL BUREAU OF INVESTIGATION


