दूसरी शादी की सिर्फ़ जानकारी होना, रिश्तेदारों को द्विविवाह के अपराध में आरोपी बनाने के लिए काफ़ी नहीं: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
24 April 2026 7:34 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (24 अप्रैल) को फ़ैसला सुनाया कि रिश्तेदारों पर द्विविवाह (दो शादियां करने) के अपराध की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ इस आधार पर नहीं डाली जा सकती कि उन्हें दूसरी शादी के बारे में जानकारी थी। कोर्ट ने कहा कि जब तक यह साबित न हो जाए कि रिश्तेदारों ने दूसरी शादी करवाने में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया, मदद की या उसे बढ़ावा दिया, तब तक उन्हें द्विविववाह के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A और 494 के तहत पति के रिश्तेदारों—जिनमें उसके पिता, माँ और बहन शामिल थे—के ख़िलाफ़ चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया। शिकायत करने वाली पत्नी ने इन रिश्तेदारों पर उसके साथ क्रूरता करने और पति को दूसरी शादी करने के लिए उकसाने का आरोप लगाया था।
यह मामला 2016 में दर्ज FIR से जुड़ा है, जिसमें महिला ने लंबे समय तक क्रूरता, दहेज के लिए उत्पीड़न और अपने पति की दूसरी शादी का आरोप लगाया था। जहाँ पति पर शारीरिक हिंसा, पैसों की माँग और धोखेबाज़ी जैसे विस्तृत आरोप लगाए गए, वहीं ससुराल वालों पर लगाए गए आरोप ज़्यादातर घटनाओं के दौरान उनकी "मौजूदगी" और पति को द्विविववाह करने के लिए सामान्य "बढ़ावा" देने तक ही सीमित थे।
शिकायतकर्ता ने आगे आरोप लगाया कि ससुराल वालों को पति की दूसरी शादी के बारे में पता था और उन्हें दहेज से जुड़े पैसों और सोने के गहनों की बिक्री से फ़ायदा हुआ था। इन दावों के आधार पर IPC की धारा 498A (क्रूरता), 494 (द्विविववाह) और 34 (सामान्य इरादा) के तहत आरोप लगाए गए।
जब ट्रायल कोर्ट ने मामले की सुनवाई आगे बढ़ाई और केरल हाईकोर्ट ने अपनी अंतर्निहित शक्तियों के तहत इसमें दखल देने से इनकार किया, तो ससुराल वालों ने कार्यवाही रद्द करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
विवादित आदेश रद्द करते हुए जस्टिस मसीह द्वारा लिखे गए फ़ैसले में ज़ोर देकर कहा गया कि दूसरी शादी की सिर्फ़ जानकारी होना द्विविववाह का अपराध नहीं माना जाएगा, जब तक कि यह सक्रिय रूप से साबित न हो जाए कि आरोपी व्यक्तियों ने दूसरी शादी करवाने में मदद की थी।
चूंकि अभियोजन पक्ष पति की दूसरी शादी में मदद करने के लिए अपीलकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी साबित नहीं कर सका, इसलिए कोर्ट ने पत्नी के आरोपों को बेबुनियाद और अस्पष्ट बताते हुए कहा कि ये बिना किसी औचित्य के लगाए गए।
अदालत ने टिप्पणी की,
“हालांकि यह आरोप लगाया गया कि आरोपी-अपीलकर्ताओं को दूसरी शादी के बारे में पता था, लेकिन सिर्फ़ यह जानकारी होना कि कोई दूसरा व्यक्ति कोई काम कर रहा है या कर चुका है, अपने आप में ज़रूरी 'साझा इरादा' (Common Intention) साबित नहीं करता। अगर यह मान भी लिया जाए कि आरोपी-अपीलकर्ताओं को दूसरी शादी के बारे में पता था, तब भी ऐसा कोई आरोप नहीं है—और न ही कोई सबूत है—जो यह बताता हो कि उन्होंने उस शादी को संपन्न कराने में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया, उसमें मदद की, या उसे बढ़ावा दिया।”
उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए अपील स्वीकार की गई।
Cause Title: SIVARAMAN NAIR AND OTHERS VERSUS STATE OF KERALA AND ANOTHER

