ज़मानत अर्ज़ी या आपराधिक मुक़दमे की सुनवाई के दौरान जजों को नैतिकता पर अपनी निजी राय से बचना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
30 Sept 2026 7:42 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ज़मानत अर्ज़ी या आपराधिक मुक़दमे की सुनवाई के दौरान, पीठासीन जज को नैतिकता पर अपनी निजी राय या मूल्यों के आधार पर फ़ैसला देने से बचना चाहिए।
जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने कहा,
"हमारा मानना है कि ज़मानत या किसी आरोपी के आपराधिक मुक़दमे से जुड़े मामले की सुनवाई करते समय अदालतों को पीठासीन जज की नैतिकता या अन्य मामलों पर निजी राय या मूल्यों के आधार पर फ़ैसला थोपने से बचना चाहिए।"
बेंच ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का वह आदेश रद्द किया, जिसमें ज़मानत देने से इनकार किया गया। हाईकोर्ट ने यह राय दी थी कि ज़मानत देने से सामाजिक व्यवस्था और पीड़ित परिवार की "नैतिकता" पर असर पड़ सकता है।
अपीलकर्ता पर आरोप है कि वह पीड़ित के पड़ोस में रहने वाला किराएदार था। शादीशुदा होने के बावजूद, उसने पीड़ित की बड़ी बहन के अपहरण की कोशिश की। इसके बाद भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम (POCSO Act), 2012 और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) की विभिन्न धाराओं के तहत FIR दर्ज की गई। उस पर आरक्षित जाति की नाबालिग के अपहरण और यौन शोषण का आरोप है।
आरोपी ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि उसके ख़िलाफ़ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही का मकसद उसे परेशान करना था, क्योंकि उसका शिकायतकर्ता महिला के साथ संबंध था।
हाईकोर्ट द्वारा सामाजिक व्यवस्था और पीड़ित परिवार की "नैतिकता" पर असर का हवाला देते हुए ज़मानत अर्ज़ी खारिज करने से नाराज़ होकर आरोपी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
शुरुआत में ही सुप्रीम कोर्ट ने ज़मानत अर्ज़ी में हाईकोर्ट द्वारा अपनी नैतिक राय थोपने वाले आदेश से असहमति जताई।
इसके अलावा, यह देखते हुए कि अपीलकर्ता-आरोपी सितंबर 2025 से यानी एक साल से ज़्यादा समय से हिरासत में है और मुक़दमे को पूरा होने में कुछ समय लगेगा, कोर्ट ने अपीलकर्ता-आरोपी को ज़मानत पर रिहा करना उचित समझा।
कोर्ट ने आदेश दिया,
“हमने पाया है कि अपील करने वाले व्यक्ति ने पहले ही एक साल से ज़्यादा समय जेल में बिता लिया है। ट्रायल पूरा होने में अभी और समय लगेगा। ऐसे हालात में, हमारी राय है कि ज़मानत का मामला बनता है।”
Cause Title: KANHA @ KANHAIYA SINGH VERSUS THE STATE OF MADHYA PRADESH & ANR.

