Immoral Trafficking Prevention | बचाई गई महिलाओं के मामले में मजिस्ट्रेट द्वारा की जाने वाली जांच के लिए दिशानिर्देश तैयार करे NJA: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
15 Oct 2026 6:13 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने 'इम्मोरल ट्रैफिक (प्रिवेंशन) एक्ट, 1956' (ITP Act) की धारा 17 के तहत मजिस्ट्रेट द्वारा की जाने वाली 'प्रारंभिक जांच' (Threshold Inquiry) में एकरूपता लाने के लिए व्यापक दिशानिर्देश बनाने को कहा। इस जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या बचाई गई वयस्क सेक्स वर्कर अपनी मर्जी से इस काम में शामिल थीं।
कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी (NJA) से कहा कि वह मजिस्ट्रेटों के लिए ऐसी जांच करने हेतु एक विस्तृत प्रोटोकॉल तैयार करे। इस मामले में याचिकाकर्ता NGO 'प्रज्वला' दिशानिर्देश तैयार करने में एकेडमी की मदद कर सकती है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा कि पूरे देश में मजिस्ट्रेट, बचाई गई वयस्क महिलाओं के संरक्षण, पुनर्वास और समाज में उनके पुन: एकीकरण (Reintegration) को लेकर कोर्ट के निर्देशों का पूरी तरह से पालन करें, इसके लिए एक समान दिशानिर्देश और उचित प्रशिक्षण जरूरी है।
यह निर्देश 'प्रज्वला बनाम भारत संघ' मामले में 29 मई, 2026 को दिए गए कोर्ट के फैसले के तहत 'पीड़ित संरक्षण योजना' (Victim Protection Plan) के पालन की निगरानी के दौरान जारी किया गया। यह मामला महिलाओं और बच्चों की मानव तस्करी और उनके व्यावसायिक यौन शोषण से जुड़ा है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस जांच का उद्देश्य मजिस्ट्रेट को यह तय करने में मदद करना है कि बचाई गई वयस्क महिला के संरक्षण, पुनर्वास और समाज में पुन: एकीकरण के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए।
'इम्मोरल ट्रैफिक (प्रिवेंशन) एक्ट, 1956' की धारा 17, वेश्यालयों से बचाई गई या पुलिस कार्रवाई के दौरान निकाली गई लड़कियों की सुरक्षित कस्टडी और पुनर्वास से संबंधित है। यह धारा मजिस्ट्रेट को यह अधिकार देती है कि वे मिली जानकारी और लड़की की उम्र की जांच का आदेश दें। अगर मजिस्ट्रेट को यकीन हो जाता है कि लड़की की उम्र 21 साल से कम है, तो वे उसे अपनी बात रखने का मौका देने के बाद किसी संरक्षण गृह (Protective Home) या अन्य उपयुक्त जगह पर एक निश्चित समय के लिए रखने का आदेश दे सकते हैं। मजिस्ट्रेट इस काम के लिए पांच प्रतिष्ठित लोगों के एक पैनल से मदद ले सकते हैं (जिसमें तीन महिलाओं का होना बेहतर है)। इस धारा के तहत दिए गए किसी भी आदेश के खिलाफ सेशन जज के पास अपील की जा सकती है।
याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट अपर्णा भट ने दलील दी कि ITPA की धारा 17 के तहत मजिस्ट्रेट द्वारा की जाने वाली 'प्रारंभिक जांच' (Threshold Inquiry) के लिए कुछ दिशानिर्देश होने चाहिए। उन्होंने कहा कि पूरे देश में मजिस्ट्रेटों द्वारा इन नियमों को एक समान तरीके से लागू किया जाना सुनिश्चित करने के लिए ऐसे दिशानिर्देश जरूरी हैं। इस पर कोर्ट ने 'नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी' से एक विस्तृत प्रोटोकॉल या दिशानिर्देश तैयार करने को कहा, ताकि मजिस्ट्रेट इस जांच को सही ढंग से कर सकें।
कोर्ट ने आगे कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा की जाने वाली इस जांच के प्रोटोकॉल में निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखा जाना चाहिए:
1. बचाई गई पीड़िता की सहमति, और उसकी यह राय कि क्या वह लंबे समय तक सुरक्षित हिरासत (safe custody) में रहना चाहती है।
2. पीड़िता का यह बयान कि उसने अपनी मर्जी से वह काम किया था या नहीं, और इस बारे में किसी सामाजिक कार्यकर्ता का आकलन।
3. क्या पीड़िता की स्थिति पर किसी तरह के दबाव, जबरदस्ती या अनुचित प्रभाव का असर है।
4. क्या पीड़िता को रिहा करने पर उसकी सुरक्षा को लेकर कोई खतरा है, या क्या उसे फिर से मानव तस्करी (re-trafficking) का शिकार बनाए जाने का कोई वास्तविक या तत्काल जोखिम है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह जांच तब भी की जानी चाहिए, जब बचाई गई वयस्क महिला यह कहे कि उसने अपनी मर्जी से वह काम किया।
अदालत ने कहा,
"दूसरे शब्दों में, मजिस्ट्रेट को हर हाल में यह शुरुआती जांच करनी चाहिए, ताकि यह तय किया जा सके कि बचाए गए वयस्क पीड़ित की सुरक्षा, पुनर्वास और उसे वापस समाज में शामिल करने के लिए आगे क्या कदम उठाए जाने चाहिए।"
अदालत ने याचिकाकर्ता को भी अनुमति दी कि वह प्रोटोकॉल तैयार करने में अकादमी की मदद कर सकता है।
यह मामला 'पीड़ित सुरक्षा योजना' (Victim Protection Plan) के पालन पर अदालत की चल रही निगरानी का हिस्सा है। केंद्र सरकार को एक नई स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया, जबकि याचिकाकर्ता से कहा गया कि वह 'नेशनल ज्यूडिशियल अकादमी' द्वारा दिशानिर्देश तैयार करने में हुई प्रगति के बारे में अदालत को जानकारी दे।
इस मामले की अगली सुनवाई 14 दिसंबर, 2026 को होगी।
Case Title : PRAJWALA VERSUS UNION OF INDIA

