'शादी के ऐसे टूटने' (Irretrievable Breakdown) के आधार पर विदेशी तलाक़ का फ़ैसला भारत में लागू नहीं: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
18 March 2026 6:43 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अमेरिका (USA) की किसी अदालत द्वारा शादी के ऐसे टूटने (जिसे ठीक न किया जा सके) के आधार पर दिया गया तलाक़ का फ़ैसला भारत में लागू नहीं होगा।
ऐसा इसलिए है, क्योंकि भारतीय क़ानून के तहत शादी के ऐसे टूटने को तलाक़ का आधार नहीं माना जाता है। इस मामले में दोनों पक्षकारों की शादी हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) के तहत हुई।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा,
"...अमेरिकी अदालत ने शादी के ऐसे टूटने के आधार पर तलाक़ का फ़ैसला दिया था। यह आधार HMA के तहत मान्य नहीं है, जो इन दोनों पक्षों पर लागू होने वाला वैवाहिक क़ानून है।"
मामले की पृष्ठभूमि
दोनों पक्षकारों की शादी दिसंबर, 2005 में मुंबई में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई, लेकिन वे अमेरिका में रह रहे थे। 2007 में भारत यात्रा के दौरान पुणे में कुछ समय साथ रहने के बाद वे सितंबर, 2008 तक अमेरिका में ही साथ रहे। इसके तुरंत बाद पत्नी ने अमेरिका की मिशिगन अदालत में तलाक़ की कार्यवाही शुरू कर दी। पति ने लिखित जवाब देकर अदालत के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाया, लेकिन उसके बाद कार्यवाही में हिस्सा नहीं लिया।
फ़रवरी, 2009 में अमेरिकी अदालत ने "शादी के ऐसे टूटने" के आधार पर तलाक़ का फ़ैसला दिया। इसके साथ ही आर्थिक मामलों पर भी निर्देश जारी किए। इसी बीच पति ने पुणे की फ़ैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक़ की अर्ज़ी दाख़िल कर दी थी।
पुणे की फ़ैमिली कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र को सही ठहराते हुए कहा कि शादी भारत में हुई और विदेशी अदालत का फ़ैसला ऐसे आधार पर था, जिसे भारतीय क़ानून मान्यता नहीं देता है। हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस फ़ैसले को पलट दिया और कहा कि दोनों पक्ष अमेरिका के निवासी थे, इसलिए अमेरिकी अदालत को ही इस मामले पर फ़ैसला देने का अधिकार था।
हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैमिली कोर्ट का फ़ैसला बहाल किया और पति (अपीलकर्ता) को तलाक़ की अर्ज़ी पर आगे बढ़ने की अनुमति दी। कोर्ट ने कहा कि चूंकि इस जोड़े ने भारत में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार शादी की थी, इसलिए भले ही वे विदेश में बस गए हों, तलाक़ की कार्यवाही के लिए उन पर हिंदू विवाह अधिनियम ही लागू होगा। इसके अलावा, इसने विदेशी डिक्री की वैधता को भी खत्म कर दिया, क्योंकि अपीलकर्ता-पति ने अमेरिका के सर्किट कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को कभी स्वीकार नहीं किया और न ही उन कार्यवाहियों में हिस्सा लिया।
कोर्ट ने कहा,
"चूंकि शादी भारत में हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार हुई, इसलिए हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) दोनों पक्षों पर लागू होगा, भले ही वे बाद में विदेश में बस गए हों।"
कोर्ट ने आगे कहा कि अपीलकर्ता-पति ने अमेरिका के सर्किट कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को कभी स्वीकार नहीं किया और न ही उन कार्यवाहियों में हिस्सा लिया था, इसलिए वह विदेशी डिक्री से बंधा हुआ नहीं है।
कोर्ट ने आगे कहा,
"यह पाया गया कि वैवाहिक घर पुणे के औंध में था, क्योंकि दोनों पक्ष भारत आने पर वहीं रुकते थे - भले ही कुछ समय के लिए ही सही - और यही वह जगह थी जहां वे भारत में आखिरी बार एक साथ रहे थे।"
इस तरह कोर्ट ने विदेशी डिक्री की वैधता रद्द की।
विदेशी डिक्री को अमान्य ठहराने के बावजूद, कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए शादी के ऐसे स्तर पर टूट जाने (Irretrievable Breakdown) के आधार पर इस जोड़े को तलाक दिया, जहां से उसे ठीक करना संभव न हो; क्योंकि यह जोड़ा 2008 से ही अलग रह रहा था और उनके बीच अब कोई वैवाहिक बंधन बाकी नहीं था।
Cause Title: K VERSUS K

