'महज पुलिस के बयान पर आधारित होने के कारण ही FIR पर शक नहीं किया जा सकता': सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST मामले में अग्रिम ज़मानत रद्द की
Shahadat
13 March 2026 6:18 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने उन लोगों की अग्रिम ज़मानत रद्द की, जिन पर कथित तौर पर अनुसूचित जाति वर्ग के सदस्यों के साथ जाति-आधारित गाली-गलौज करने का आरोप था। कोर्ट ने कहा कि किसी FIR की प्रामाणिकता पर सिर्फ इसलिए शक नहीं किया जा सकता कि वह किसी शिकायतकर्ता के बजाय पुलिस के बयान के आधार पर दर्ज की गई।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें SC/ST मामले में अग्रिम ज़मानत दी गई। हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारी के बयान के आधार पर दर्ज FIR की असलियत और प्रामाणिकता पर संदेह जताया था।
यह मामला दो गुटों के बीच हुए विवाद से जुड़ा है। अनुसूचित जाति समुदाय के सदस्यों ने आरोप लगाया कि उच्च जाति समुदाय के सदस्यों के घरों से निकलने वाला नाली का पानी उनके घरों में मोड़ा जा रहा था। जब प्रभावित निवासियों ने इसका विरोध किया, तो इलाके में तनाव बढ़ गया।
पुलिस अधिकारी स्थिति को शांत करने और दोनों गुटों के बीच सुलह कराने की कोशिश करने के लिए मौके पर पहुंचे। हालांकि, कथित तौर पर यह टकराव हिंसक हो गया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी गुट के सदस्यों ने हथियारों का इस्तेमाल किया और शिकायतकर्ता पक्ष के लोगों के साथ जाति-आधारित गाली-गलौज भी की। बताया जाता है कि इस घटना का वीडियो भी बनाया गया।
मौके पर मौजूद एक पुलिस अधिकारी के बयान और उपलब्ध सबूतों के आधार पर पुलिस ने एक FIR दर्ज की, जिसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act), भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) और शस्त्र अधिनियम, 1959 (Arms Act) के तहत अपराधों का आरोप लगाया गया।
जांच के दौरान, अधिकारियों ने शिकायतकर्ता के गुट के खिलाफ भी दर्ज एक जवाबी मामले की जांच की, जो इसी घटना से जुड़ा था। वह मामला आखिरकार बंद कर दिया गया, क्योंकि जांच में यह निष्कर्ष निकला कि आरोपी के तौर पर नामजद किए गए लोग निर्दोष हैं।
आरोपियों ने अग्रिम ज़मानत के लिए पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने उन्हें राहत देते हुए इस बात पर काफी ज़ोर दिया कि FIR कथित पीड़ित की शिकायत पर नहीं, बल्कि एक पुलिस अधिकारी के बयान पर दर्ज की गई थी। कोर्ट ने इस बात पर भी संदेह जताया कि क्या लगाए गए आरोपों से SC/ST Act के तहत कोई अपराध बनता है, जिसके बाद एससी गुट के सदस्य सुप्रीम कोर्ट चले गए।
विवादित आदेश रद्द करते हुए बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट ने FIR के स्रोत को ज़रूरत से ज़्यादा अहमियत देकर गलती की है, जबकि उसे यह देखना चाहिए था कि क्या जानकारी से किसी संज्ञेय अपराध (गंभीर अपराध) के होने का पता चलता है।
कोर्ट ने कहा,
"हम आदेश से देखते हैं कि हाईकोर्ट ने मुख्य रूप से इस बात पर भरोसा किया कि आरोपी द्वारा जाति से जुड़ी गाली-गलौज के मामले में कथित पीड़ित, यानी पहले अपीलकर्ता की ओर से कोई शिकायत नहीं की गई। FIR एक पुलिस अधिकारी के बयान पर दर्ज की गई।"
कोर्ट ने यह भी बताया कि जानकारी का स्रोत तब बेमानी हो जाता है, जब उससे किसी संज्ञेय अपराध के होने का पता चलता है; खासकर इस मामले में, जहां FIR एक ऐसे पुलिस अधिकारी के बयान पर आधारित थी, जिसने खुद घटना को अपनी आँखों से देखा था।
कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने कई अहम सबूतों को नज़रअंदाज़ किया, जिनमें जांच रिपोर्ट और पुलिस का हलफ़नामा भी शामिल था। इन दस्तावेज़ों में घटना के दौरान हथियारों के इस्तेमाल और जाति-आधारित गाली-गलौज का ज़िक्र था।
कोर्ट ने कहा,
"अपीलकर्ताओं के वकील ने हमें हाईकोर्ट में डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस द्वारा दायर किए गए संक्षिप्त हलफ़नामे और रिकॉर्ड में मौजूद जांच रिपोर्ट से भी अवगत कराया। इन दस्तावेज़ों में साफ़ तौर पर गोलियां चलाए जाने और जातिसूचक गालियां दिए जाने के आरोप लगाए गए, जिन्हें हाईकोर्ट ने नज़रअंदाज़ कर दिया।"
नतीजतन, अपील को मंज़ूर कर लिया गया और प्रतिवादियों को दी गई गिरफ़्तारी-पूर्व ज़मानत (Pre-Arrest Bail) रद्द कर दी गई। साथ ही उन्हें 15 दिनों के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया।
Cause Title: Kuldeep Singh and Anr. Versus State of Punjab and Anr. (with connected appeal)

