चेक बाउंस मामले में कंपनी को आरोपी न बनाना CrPC की धारा 319 के तहत समन भेजकर ठीक नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

5 Aug 2026 3:14 PM IST

  • चेक बाउंस मामले में कंपनी को आरोपी न बनाना CrPC की धारा 319 के तहत समन भेजकर ठीक नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 138 के तहत चेक बाउंस की शिकायत में कंपनी को आरोपी न बनाना एक ऐसी गंभीर कमी है, जिसे बाद में ट्रायल के दौरान क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) की धारा 319 के तहत कंपनी को अतिरिक्त आरोपी के तौर पर समन भेजकर ठीक नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने फैसला सुनाया कि जब कोई चेक कंपनी के बैंक अकाउंट से जारी किया जाता है तो NI Act की धारा 141 के तहत कंपनी के डायरेक्टर या अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं (Authorized Signatories) पर 'विकेरियस लायबिलिटी' (दूसरों के काम के लिए जिम्मेदारी) तय करने के लिए कंपनी पर मुकदमा चलाना एक अनिवार्य शर्त है। इसलिए ट्रायल शुरू होने के बाद कंपनी को पक्षकार बनाने के लिए CrPC की धारा 319 का इस्तेमाल करने का ट्रायल कोर्ट को निर्देश देकर हाईकोर्ट ने गलती की।

    कोर्ट मंजुला कपूर द्वारा हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रहा था। शिकायत में आरोप लगाया गया कि M/s सिने प्राइम एंटरटेनमेंट पर शिकायतकर्ता के 5 लाख रुपये बकाया थे और उसने कपूर, जो इसकी अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता थीं, के हस्ताक्षर वाला एक चेक जारी किया। चेक बाउंस होने के बाद शिकायतकर्ता ने कंपनी को आरोपी बनाए बिना या उसे कानूनी डिमांड नोटिस भेजे बिना केवल कपूर के खिलाफ कार्यवाही शुरू की। हालांकि, हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता को CrPC की धारा 319 के तहत कंपनी को अतिरिक्त आरोपी के तौर पर समन भेजकर इस कमी को दूर करने की अनुमति दे दी। इसे चुनौती देते हुए डायरेक्टर सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं।

    सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें ट्रायल कोर्ट को अपीलकर्ता-कंपनी को ट्रायल में शामिल होने के लिए CrPC की धारा 319 के तहत नोटिस जारी करने के बाद नए सिरे से ट्रायल (de novo trial) शुरू करने का निर्देश दिया गया था।

    कंपनी के किसी भी डायरेक्टर पर मुकदमा चलाने के लिए कंपनी को आरोपी बनाना अनिवार्य है, जैसा कि अनीता हाडा बनाम गॉडफादर ट्रैवल्स एंड टूर्स (P) लिमिटेड, (2012) 5 SCC 661 में कहा गया है। चूंकि कंपनी को आरोपी नहीं बनाया गया था, इसलिए अपीलकर्ता-डायरेक्टर के खिलाफ शिकायत कानूनी रूप से मान्य नहीं होगी; इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि कंपनी को मामले में शामिल न करने की कमी को CrPC की धारा 319 का इस्तेमाल करके ठीक नहीं किया जा सकता।

    कोर्ट ने एन. हरिहारा कृष्णन बनाम जे. थॉमस (2018) मामले का हवाला देते हुए कहा,

    "...जब शिकायत में इतनी बड़ी कमी हो कि उस पर संज्ञान (Cognizance) ही न लिया जा सके तो कोर्ट आगे नहीं बढ़ सकती और उस कमी को दूर करने के लिए धारा 319 के प्रावधानों का सहारा नहीं ले सकती। कारण सीधा है, अगर शिकायत में कोई गंभीर कमी है तो कार्यवाही की शुरुआत ही वैध नहीं मानी जाएगी। ऐसे हालात में कमी को दूर करने के बाद ही नई शिकायत दर्ज की जा सकती है, बशर्ते यह एक्ट में तय समय-सीमा के भीतर हो।"

    कोर्ट ने गौर किया कि आरोपी कंपनी के खिलाफ संज्ञान लेना समय-सीमा (time-bar) के दायरे से बाहर होगा। हालांकि NI Act की धारा 142 देरी को माफ करने की शक्ति देती है, लेकिन इसका इस्तेमाल शिकायत की गंभीर कमी को दूर करने के लिए नहीं किया जा सकता। धारा 319 के तहत बाद में कंपनी को शामिल करने की अनुमति देने का मतलब होगा कि शिकायतकर्ता कानूनी समय-सीमा को पार कर रहा है।

    आगे कहा गया,

    "इसमें कोई शक नहीं कि संज्ञान लेने के लिए अधिकृत कोर्ट के पास NI Act की धारा 142 की उप-धारा (1) के प्रावधान के तहत तय समय के बाद की गई शिकायत पर संज्ञान लेने की शक्ति है, बशर्ते वह इस बात से संतुष्ट हो कि शिकायतकर्ता के पास उस समय के भीतर शिकायत न करने का पर्याप्त कारण था। लेकिन इस शक्ति का इस्तेमाल एक्ट के प्रावधानों को दरकिनार करने और शिकायतकर्ता को कार्यवाही के दौरान गंभीर कमियों को दूर करने की अनुमति देने के लिए नहीं किया जाना चाहिए, जबकि शिकायत को तो शुरुआत में ही खारिज कर दिया जाना चाहिए।"

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां ऐसी कमी मौजूद हो, वहां एकमात्र स्वीकार्य तरीका यह है कि कमी को दूर करने के बाद नई शिकायत दर्ज की जाए, बशर्ते यह समय-सीमा के भीतर हो या NI Act की धारा 142 के प्रावधान के तहत देरी को माफ किया गया हो।

    यह मानते हुए कि हाईकोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया, सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत और कपूर के खिलाफ सभी संबंधित कार्यवाहियों को रद्द कर दिया।

    कोर्ट ने कहा,

    “…हमारा मानना ​​है कि हाई कोर्ट ने मजिस्ट्रेट/ट्रायल कोर्ट को कंपनी को खुद से (suo moto) आरोपी बनाने का निर्देश देकर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया। इसके अलावा, इस बात को ध्यान में रखते हुए कि शिकायत में एक गंभीर कमी थी, हमें यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि शिकायत और उससे जुड़ी सभी कार्यवाही रद्द की जानी चाहिए और हम उन्हें रद्द करते हैं।”

    इसके अनुसार, अपील मंज़ूर की गई।

    शिकायतकर्ता को ये बातें साबित करनी होंगी

    फ़ैसले में चेक बाउंस (चेक डिसऑनर) के अपराध के लिए ज़रूरी बातों पर भी चर्चा की गई।

    NI Act की धारा 138 को पढ़ने से यह साफ़ हो जाता है कि धारा 138 के तहत सज़ा-योग्य अपराध के लिए किसी व्यक्ति पर सफलतापूर्वक मुक़दमा चलाने के लिए शिकायतकर्ता को ये बातें साबित करनी होंगी:

    “(i) उस व्यक्ति ने बैंकर के पास अपने खाते से एक चेक जारी किया।

    (ii) वह चेक किसी दूसरे व्यक्ति को पैसे का भुगतान करने के लिए जारी किया गया, ताकि किसी कर्ज़ या अन्य देनदारी को पूरी तरह या आंशिक रूप से चुकाया जा सके।

    (iii) वह चेक जारी होने की तारीख से छह महीने के भीतर या उसकी वैधता की अवधि के भीतर (जो भी पहले हो) बैंक में पेश किया गया।

    (iv) बैंक ने उस चेक का भुगतान नहीं किया और उसे वापस कर दिया, या तो इसलिए कि खाते में चेक का भुगतान करने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे या इसलिए कि वह राशि उस बैंक के साथ हुए समझौते के तहत खाते से भुगतान की जाने वाली राशि से ज़्यादा थी।

    (v) चेक पाने वाले (पेई) या चेक के सही धारक (होल्डर इन ड्यू कोर्स) ने, जैसा भी मामला हो, चेक जारी करने वाले (ड्रॉअर) से लिखित रूप में चेक के तहत देय राशि का भुगतान करने की मांग की।

    (vi) भुगतान के लिए ऐसा नोटिस, बैंक से चेक के भुगतान न होने और वापसी की जानकारी मिलने की तारीख से तीस दिनों के भीतर दिया गया।

    (vii) ऐसे चेक को जारी करने वाला व्यक्ति, उक्त नोटिस मिलने के 15 दिनों के भीतर चेक पाने वाले या, जैसा भी मामला हो, चेक के सही धारक को उक्त राशि का भुगतान करने में विफल रहा।”

    Cause Title: MANJULA KAPOOR VERSUS THE STATE OF HIMACHAL PRADESH AND ANR.

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