गलती से ज़्यादा सैलरी मिलने पर अंडरटेकिंग देने वाले कर्मचारियों से पैसे वापस लिए जा सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षकों की अपील खारिज की
Shahadat
6 Oct 2026 1:33 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (NIT), कालीकट के शिक्षकों को गलती से दिए गए 'एकेडमिक ग्रेड पे' (Academic Grade Pay) के फ़ायदों की रिकवरी को सही ठहराया है। कोर्ट ने कहा कि रिकवरी सही थी क्योंकि शिक्षकों ने ज़्यादा पेमेंट वापस करने के लिए लिखित अंडरटेकिंग दी थी।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने केरल हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील को खारिज करते हुए यह आदेश दिया।
यह मामला अपील करने वालों को 'एकेडमिक ग्रेड पे' देने से जुड़ा है। उन्हें अक्टूबर 2009 के आसपास ये फ़ाइनेंशियल फ़ायदे दिए गए थे और जनवरी 2010 में वापस ले लिए गए। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि उन्होंने ज़रूरी सालों तक सर्विस पूरी नहीं की थी। इसके बाद केरल हाई कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की गई थी।
बता दें, केरल हाईकोर्ट के सिंगल जज ने नवंबर 2014 में शिक्षकों की रिट याचिकाओं को मंज़ूरी देते हुए उनके पक्ष में फ़ैसला सुनाया था। अपील में, डिवीज़न बेंच ने नवंबर 2015 में इस फ़ैसले को पलट दिया।
डिवीज़न बेंच के फ़ैसले को पलटे जाने से नाराज़ होकर शिक्षकों ने सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटिशन (SLP) दायर की।
सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल पर विचार किया:
“क्या उन फ़ाइनेंशियल फ़ायदों को वापस लिया जा सकता है, जो रेस्पॉन्डेंट्स (प्रतिवादियों) ने अपनी मर्ज़ी से शिक्षकों के एक वर्ग को दिए थे, और जिसमें उन शिक्षकों की तरफ़ से कोई गलत जानकारी, धोखाधड़ी या गलती नहीं थी?”
सुप्रीम कोर्ट के सामने याचिकाकर्ताओं (शिक्षकों) ने 'स्टेट ऑफ़ पंजाब बनाम रफ़ीक मसीह (व्हाइट वॉशर)' और 'थॉमस डैनियल बनाम स्टेट ऑफ़ केरल' का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि उनका मामला 'रफ़ीक मसीह (व्हाइट वॉशर)' केस के पैरा 18 के क्लॉज़ (v) के तहत आता है। यह क्लॉज़ रिकवरी पर रोक लगाता है अगर रिकवरी करना "इतना अनुचित, कठोर या मनमाना हो कि वह एम्प्लॉयर के रिकवरी के अधिकार के उचित संतुलन से कहीं ज़्यादा भारी पड़ जाए।"
इस दलील के संबंध में कोर्ट ने कहा कि 'रफ़ीक मसीह (व्हाइट वॉशर)' केस का "एक पुराना इतिहास है। इसलिए इसे अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता।" इसके बजाय, इसमें 'चंडी प्रसाद उनियाल बनाम उत्तराखंड राज्य' मामले का ज़िक्र किया गया, जिसमें यह तय किया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है कि ज़्यादा पेमेंट तभी वापस लिया जा सकता है, जब पाने वाले ने गलत जानकारी दी हो या धोखाधड़ी की हो।
'चंडी प्रसाद उनियाल' मामले में यह भी कहा गया था,
"कानूनी अधिकार के बिना दी गई या ली गई कोई भी रकम हमेशा वापस ली जा सकती है, सिवाय कुछ खास मुश्किल हालात के; लेकिन यह अधिकार के तौर पर नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थितियों में कानून पाने वाले पर पैसे वापस करने की ज़िम्मेदारी डालता है, वरना यह गलत तरीके से फायदा उठाने जैसा होगा।"
'साहिब राम बनाम हरियाणा राज्य', 'श्याम बाबू वर्मा बनाम भारत संघ' और 'चंडी प्रसाद उनियाल' मामलों का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने इस तरह समझाया:
"ऊपर दिए गए हिस्से को पढ़ने से तार्किक रूप से यह नतीजा निकलता है कि 'चंडी प्रसाद उनियाल' (ऊपर बताया गया) मामले में कानून संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत इस कोर्ट के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए तय किया गया, जो हमारी समझ से अनुच्छेद 141 के तहत सभी अदालतों पर बाध्यकारी होगा; जबकि 'साहिब राम' (ऊपर बताया गया) और 'श्याम बाबू' (ऊपर बताया गया) मामलों में फैसले अनुच्छेद 142 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करके दिए गए।"
इस तरह कोर्ट ने माना कि 'साहिब राम' और 'श्याम बाबू' के बाद दिए गए फैसले, जो अनुच्छेद 142 के तहत दिए गए, बाध्यकारी मिसाल (Precedent) के तौर पर लागू नहीं होते। इसके बावजूद, 'रफीक मसीह (व्हाइट वॉशर)' मामले में बेंच ने "'चंडी प्रसाद उनियाल' (ऊपर बताया गया) में तय किए गए कानून को लागू नहीं किया और 'साहिब राम' (ऊपर बताया गया), 'श्याम बाबू' (ऊपर बताया गया) और 'सैयद अब्दुल कादिर' (ऊपर बताया गया) मामलों में अपनाए गए तरीके को ही मानना बेहतर समझा।"
कोर्ट ने यह भी बताया कि "किसी भी पुराने मामले में कॉन्ट्रैक्ट एक्ट, 1872 की धारा 72 के लागू होने पर कोई टिप्पणी नहीं की गई," और चंडी प्रसाद उनियाल मामले का फैसला भी, बिना इसका ज़िक्र किए, इसी से प्रेरणा लेता है।
बता दें, इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट, 1872 की धारा 72 अनुचित लाभ (Unjust Enrichment) से संबंधित है और इसके तहत जिस व्यक्ति को गलती से या दबाव में पैसे का भुगतान किया गया, उसे वह पैसा वापस करना होता है।
इसके अलावा, कोर्ट ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट बनाम जगदेव सिंह मामले का हवाला दिया, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि रफ़ीक मसीह (व्हाइट वॉशर) मामले के पैराग्राफ 18 की दूसरी श्रेणी के तहत मिलने वाली सुरक्षा वहां लागू नहीं होती जहां अधिकारी को पहले ही बता दिया गया था कि अतिरिक्त भुगतान वापस करना होगा और उसने संशोधित वेतनमान चुनते समय एक अंडरटेकिंग (लिखित वचन) दी थी।
इसके बाद बेंच ने ऊपर बताई गई बातों के आधार पर मामले के तथ्यों पर विचार किया। NIT ने शिक्षकों द्वारा दी गई एक अंडरटेकिंग रिकॉर्ड पर रखी थी, जिसमें वे वेतन निर्धारण में गलती पाए जाने पर रिकवरी (पैसे की वापसी) के लिए सहमत थे। डिवीज़न बेंच ने माना था कि NIT ने केवल एक गलती सुधारी थी। उसने यह भी पाया कि एसोसिएट प्रोफेसर के तौर पर नियुक्ति के कारण शिक्षकों को कोई अतिरिक्त काम नहीं करना पड़ा था और वे किसी विशेष श्रेणी में नहीं आते थे।
इन बातों को ध्यान में रखते हुए बेंच ने कहा,
"इसलिए यह स्पष्ट है कि अपीलकर्ताओं को वित्तीय लाभ देने में गलती हुई थी; और गलती का पता चलते ही इसे तुरंत वापस ले लिया गया। अपीलकर्ताओं को गलती से भुगतान की गई राशि की ऐसी रिकवरी, उनके द्वारा दिए गए वचनों को देखते हुए सिंगल जज द्वारा रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करके हस्तक्षेप करने का आधार नहीं बनती है, और डिवीज़न बेंच का रोक लगाने का फैसला सही लगता है।"
इसके विपरीत, अपीलकर्ताओं ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय के निदेशक द्वारा सभी NIT के निदेशकों को भेजे गए एक पत्र का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि "पहले से दिए गए लाभ संस्थानों के एकेडमिक स्टाफ से वापस नहीं लिए जाएंगे।" कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया क्योंकि रिकवरी रिट याचिका दायर होने से दो साल पहले ही की जा चुकी थी।
अपीलकर्ताओं के मामले में कोई दम न पाते हुए कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज की और डिवीज़न बेंच का आदेश बरकरार रखा।
Case Title : Dr MK Ravi Varma etc etc v National Institute of Technology and Ors.

