पोस्ट-डेटेड चेक का डिसऑनर होना ही धोखाधड़ी के लिए बेईमान इरादे का अनुमान लगाने के लिए काफी नहीं: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

19 March 2026 9:27 PM IST

  • पोस्ट-डेटेड चेक का डिसऑनर होना ही धोखाधड़ी के लिए बेईमान इरादे का अनुमान लगाने के लिए काफी नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत धोखाधड़ी के दायरे को स्पष्ट करते हुए महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पोस्ट-डेटेड चेक का डिसऑनर होना, अपने आप में चेक जारी करने वाले (Drawer) के बेईमान इरादे का अनुमान लगाने के लिए काफी नहीं है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि धोखाधड़ी के लिए आपराधिक दायित्व के लिए, लेन-देन की शुरुआत में ही कपटपूर्ण इरादे का सबूत होना जरूरी है। इसका अनुमान केवल बाद में वादा पूरा न कर पाने से नहीं लगाया जा सकता।

    जस्टिस पामिडीघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ एक अपील मंजूर की, जिसमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी के आरोपों को रद्द करने से इनकार किया गया था।

    मामले की पृष्ठभूमि

    यह मामला एक फिल्म प्रोजेक्ट से जुड़े वित्तीय समझौते से उत्पन्न हुआ था। अपीलकर्ता ने एक फिल्म बनाने के लिए शिकायतकर्ता से पैसे मांगे थे, और मुनाफे में हिस्सेदारी देने का वादा किया। शिकायतकर्ता ने शुरू में 30% रिटर्न के भरोसे पर पैसे निवेश किए और बाद में अधिक हिस्सेदारी के वादे पर और पैसे दिए।

    प्रोजेक्ट से जब कोई मुनाफा नहीं हुआ तो अपीलकर्ता ने मूल राशि चुकाने के लिए 24 लाख रुपये के दो पोस्ट-डेटेड चेक जारी किए। ये चेक खाते में पर्याप्त पैसे न होने के कारण डिसऑनर हो गए, जिससे धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वास भंग (Criminal Breach of Trust) के आरोप लगे।

    पुलिस ने जांच के बाद अंतिम रिपोर्ट (फाइनल रिपोर्ट) दाखिल की। ​​अपीलकर्ता ने फाइनल रिपोर्ट रद्द करवाने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने IPC की धारा 406 (आपराधिक विश्वास भंग) के तहत कार्यवाही रद्द की, लेकिन उसने IPC की धारा 420 (धोखाधड़ी) के तहत मुकदमा जारी रखने की अनुमति दी, यह मानते हुए कि पहली नज़र में (Prima Facie) प्रलोभन और गलतबयानी के तत्व मौजूद थे।

    सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

    हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उस स्थापित कानूनी स्थिति को दोहराया कि धोखाधड़ी के अपराध के लिए, वादा करते समय ही बेईमान या कपटपूर्ण इरादा मौजूद होना चाहिए।

    कोर्ट ने पिछले फैसलों (Precedents) का हवाला दिया, जिनमें Iridium India Telecom Ltd. v. Motorola Inc. (2011) 1 SCC 74 और Vesa Holdings Pvt. Ltd. v. State of Kerala (2015) 8 SCC 293 शामिल हैं। कोर्ट ने कहा कि केवल अनुबंध का उल्लंघन या वादा पूरा न कर पाना अपने आप में धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता। खास बात यह है कि कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि मूल लेन-देन की प्रकृति पर विचार किया जाना चाहिए। मौजूदा मामले में निवेश एक फ़िल्म प्रोजेक्ट में किया गया, जो स्वाभाविक रूप से सट्टेबाज़ी वाला और जोखिम भरा होता है।

    “फ़िल्म बनाना एक बहुत ज़्यादा जोखिम वाला काम है। कोई भी पक्के तौर पर यह नहीं कह सकता कि कोई फ़िल्म मुनाफ़ा कमाएगी या फ़्लॉप हो जाएगी।”

    चूंकि फ़िल्म असल में पूरी हो गई और रिलीज़ भी हो गई, इसलिए कोर्ट को इस नतीजे पर पहुंचने का कोई आधार नहीं मिला कि शुरुआती वादा ही झूठा था या बेईमानी की नीयत से किया गया।

    सिर्फ़ पोस्ट-डेटेड चेक के बाउंस होने से धोखाधड़ी का अपराध नहीं बनता

    मुख्य मुद्दे पर बात करते हुए कोर्ट ने पोस्ट-डेटेड चेक जारी करने और पैसे देने के लिए उकसाने के बीच एक साफ़ फ़र्क किया।

    कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि मौजूदा मामले में पोस्ट-डेटेड चेक शिकायतकर्ता को निवेश करने के लिए उकसाने के लिए नहीं, बल्कि पहले से मौजूद किसी देनदारी को चुकाने के लिए जारी किए गए। इसलिए उनके बाउंस होने से लेन-देन की शुरुआत में बेईमानी की नीयत का होना पीछे जाकर साबित नहीं किया जा सकता।

    खास तौर पर कोर्ट ने यह टिप्पणी की:

    "आम तौर पर पोस्ट-डेटेड चेक या तो पहले से मौजूद या भविष्य की किसी देनदारी को चुकाने के लिए ज़मानत के तौर पर जारी किए जाते हैं, या फिर भविष्य में किसी समय देनदारी चुकाने के लिए जारी किए जाते हैं। यह पूरी तरह मुमकिन है कि पोस्ट-डेटेड चेक जारी करते समय चेक लिखने वाले के पास यह मानने का कोई कारण हो कि चेक की तारीख तक उसके खाते में काफ़ी बैलेंस होगा। इसलिए हमारी राय में सिर्फ़ पोस्ट-डेटेड चेक का बाउंस होना, चेक लिखने वाले की तरफ़ से बेईमानी की नीयत होने का अंदाज़ा लगाने के लिए काफ़ी नहीं है।"

    बेंच ने इस बात पर ध्यान दिया कि पोस्ट-डेटेड चेक अक्सर इस उम्मीद के साथ जारी किए जाते हैं कि तय तारीख पर खाते में काफ़ी पैसे मौजूद होंगे। उनके बाउंस होने से 'नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट' (NI Act) की धारा 138 के तहत कानूनी कार्रवाई शुरू हो सकती है, लेकिन इससे अपने आप धोखाधड़ी के लिए आपराधिक ज़िम्मेदारी तय नहीं हो जाती।

    कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा कि यह विवाद असल में दीवानी (सिविल) प्रकृति का था, जो एक नाकाम कारोबारी कोशिश से पैदा हुआ था। कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि ऐसी परिस्थितियों में आपराधिक मुकदमा चलाने की इजाज़त देना कानूनी प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल माना जाएगा।

    तदनुसार, कोर्ट ने IPC की धारा 420 के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की और यह टिप्पणी की कि हाईकोर्ट शुरू से ही बेईमानी की नीयत न होने की बात को समझने में नाकाम रहा था।

    Case : V Ganesan v State

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