आर्बिट्रेशन क्लॉज़ होने से कंज्यूमर फोरम का अधिकार क्षेत्र खत्म नहीं होता: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
19 Jun 2026 7:09 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि किसी एग्रीमेंट में आर्बिट्रेशन क्लॉज़ (मध्यस्थता खंड) होने मात्र से कंज्यूमर फोरम को मामले के गुण-दोष के आधार पर फैसला करने से नहीं रोका जा सकता।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने कहा,
"...आर्बिट्रेशन क्लॉज़ अपने आप में कंज्यूमर फोरम के अधिकार क्षेत्र को खत्म नहीं करता है।"
बेंच ने नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट रिड्रेसल कमीशन (NCDRC), स्टेट कमीशन और डिस्ट्रिक्ट फोरम के उन फैसलों को रद्द किया, जिनमें रेजिडेंशियल फ्लैट का कब्ज़ा सौंपने में देरी से जुड़े विवाद को आर्बिट्रेशन के लिए भेज दिया गया।
यह मामला अपीलकर्ता द्वारा फ्लैट का कब्ज़ा सौंपने में देरी के लिए 'सेवा में कमी' (deficiency in service) का आरोप लगाते हुए कंज्यूमर शिकायत दर्ज करने से जुड़ा है। चूंकि फ्लैट खरीद एग्रीमेंट में आर्बिट्रेशन क्लॉज़ था, इसलिए डिस्ट्रिक्ट फोरम ने शिकायत स्वीकार करने और प्रतिवादी को नोटिस जारी करने के बावजूद विवाद को आर्बिट्रेशन के लिए भेज दिया। डिस्ट्रिक्ट फोरम के फैसले को स्टेट कमीशन और उसके बाद नेशनल कमीशन ने भी सही ठहराया, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में यह अपील की गई।
अपील स्वीकार करते हुए जस्टिस नाथ ने 'एमार एमजीएफ लैंड लिमिटेड बनाम आफताब सिंह, (2019) 12 SCC 751' मामले का हवाला देते हुए आदेश में कहा:
"1986 का एक्ट कंज्यूमर विवादों के लिए विशेष न्याय-निर्णय तंत्र (adjudicatory mechanism) बनाता है। एक बार जब उस तंत्र का सही तरीके से इस्तेमाल किया जाता है और शिकायत स्वीकार कर ली जाती है तो कंज्यूमर को केवल इसलिए उस फोरम से बाहर नहीं किया जा सकता, क्योंकि पार्टियों के बीच एग्रीमेंट में आर्बिट्रेशन क्लॉज़ है। किसी प्राइवेट कॉन्ट्रैक्ट क्लॉज़ को उस कानूनी उपाय (statutory remedy) के कामकाज को विफल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जिसे संसद ने स्पष्ट रूप से 1986 के एक्ट की धारा 3 के तहत अन्य उपायों के अतिरिक्त बनाया है।"
कोर्ट ने कहा,
"सिर्फ़ इसलिए कि पार्टियों के बीच हुए समझौते में आर्बिट्रेशन क्लॉज़ (मध्यस्थता की शर्त) था, इसे कंज्यूमर फ़ोरम के सामने अपील करने वाले की याचिका खारिज करने का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।"
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया,
"एक बार जब शिकायत स्वीकार कर ली जाती है और उस पर आगे कार्रवाई की अनुमति मिल जाती है तो फ़ोरम को उस पर कानून के तहत बताए गए तरीके से ही कार्रवाई करनी होती है। धारा 12(4) के प्रावधान में कानून के तहत एक स्पष्ट रोक लगाई गई। इसमें कहा गया कि अगर डिस्ट्रिक्ट फ़ोरम ने कोई शिकायत स्वीकार की तो उसे किसी दूसरी अदालत, ट्रिब्यूनल या अथॉरिटी को ट्रांसफर नहीं किया जाएगा, जिसे किसी दूसरे लागू कानून के तहत बनाया गया हो।"
नतीजतन, अपील मंज़ूर की गई और डिस्ट्रिक्ट फ़ोरम को निर्देश दिया गया कि वह विवाद के गुण-दोष के आधार पर फ़ैसला करे, और हो सके तो एक साल के भीतर ऐसा करे।
Cause Title: T.K.A. PADMANABHAN VERSUS ABHIYAN COOPERATIVE GROUP HOUSING SOCIETY LTD

