Canara Bank Regulations | जब एक ही मामले में कई अधिकारी शामिल हों तो संयुक्त अनुशासनात्मक कार्यवाही ज़रूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
15 May 2026 9:54 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि केनरा बैंक अधिकारी कर्मचारियों (अनुशासन और अपील) विनियम, 1976 के विनियम 10 के अनुसार, किसी दोषी बैंक कर्मचारी के खिलाफ अलग से अनुशासनात्मक कार्यवाही करना स्वीकार्य है, भले ही किसी दोषी कृत्य में कई अधिकारी शामिल हों; क्योंकि जहां एक से ज़्यादा अधिकारी शामिल हों, वहाँ संयुक्त अनुशासनात्मक कार्यवाही करने का कोई अनिवार्य नियम नहीं है।
जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच के आदेश के उस हिस्से को रद्द किया, जिसमें यह माना गया कि किसी दोषी कृत्य में शामिल कई अधिकारियों के खिलाफ संयुक्त/साझी कार्यवाही न करने से अनुशासनात्मक कार्यवाही अमान्य हो जाएगी।
इसके बजाय, कोर्ट ने हाईकोर्ट के सिंगल जज की उस टिप्पणी का समर्थन किया, जिसमें उन्होंने कहा था:
“विनियम 10 किसी दोषी अधिकारी/कर्मचारी को संयुक्त या साझी कार्यवाही करने की ज़िद करने या माँग करने का कोई अधिकार या शक्ति नहीं देता है। कर्मचारी के पास ऐसा कोई संबंधित अधिकार नहीं है,” और यह कि “[संयुक्त जाँच न करने से] किसी एक अधिकारी के खिलाफ पहले से शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही अमान्य नहीं होती है।”
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद बैंक द्वारा उन अधिकारियों के खिलाफ शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही से पैदा हुआ, जिन पर कथित तौर पर एक ही कदाचार में शामिल होने का आरोप था। कोर्ट के सामने मुख्य कानूनी सवालों में से एक यह था कि क्या विनियम 10 बैंक को सभी दोषी अधिकारियों के खिलाफ एक साथ साझी जाँच करने के लिए बाध्य करता है।
विनियम 10 में यह प्रावधान है कि जहां किसी मामले में दो या दो से ज़्यादा अधिकारी कर्मचारी शामिल हों, वहां सक्षम अनुशासनात्मक प्राधिकारी “निर्देश दे सकता है” कि उन सभी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही एक साझी कार्यवाही के रूप में की जाए।
कर्मचारियों ने तर्क दिया कि जब एक ही लेन-देन में कई अधिकारी शामिल थे तो बैंक के लिए संयुक्त अनुशासनात्मक जांच करना अनिवार्य था। यह तर्क दिया गया कि अलग-अलग कार्यवाही से विसंगतियाँ पैदा हो सकती हैं और कर्मचारियों के साथ पक्षपात हो सकता है।
इस मुद्दे पर न्यायिक राय अलग-अलग रही हैं। कर्नाटक हाईकोर्ट ने अरुण कुमार अल्वा बनाम विजया बैंक, 2006 मामले में इस प्रावधान की व्याख्या अनिवार्य नियम के रूप में की थी। साथ ही प्रभावी रूप से “सकता है” (may) शब्द को “चाहिए” (shall) के रूप में माना था। हालांकि, आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने टी. बाबा प्रसाद बनाम आंध्रा बैंक, 2011 मामले में इसके विपरीत विचार व्यक्त किया। यह भी माना कि यह प्रावधान केवल बैंक को, जहां उचित हो, साझी कार्यवाही करने का अधिकार देता है। इस मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट के सिंगल जज ने 'may' (सकते हैं) शब्द को विवेकाधीन माना, जिससे अनुशासनात्मक समिति को यह विवेक मिला कि वह या तो कई अधिकारियों के खिलाफ मिलकर कार्रवाई करे या दोषी अधिकारी के खिलाफ अलग से कार्रवाई करे। हालांकि, डिवीज़न बेंच ने इसके विपरीत फैसला सुनाया, और 'may' की व्याख्या 'shall' (चाहिए) के रूप में की, जिसके चलते केनरा बैंक ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
फैसला
अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए जस्टिस भट्टी द्वारा लिखे गए फैसले में टी बाबा प्रसाद मामले में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा अपनाए गए तर्क को मंज़ूरी दी गई और कर्नाटक हाईकोर्ट की विपरीत व्याख्या को रद्द कर दिया गया।
कोर्ट ने कहा कि रेगुलेशन 10 को इसलिए बनाया गया ताकि जहां ज़रूरी हो, वहां संयुक्त कार्रवाई करना आसान हो सके; लेकिन इसने कर्मचारियों को ऐसी कार्रवाई की मांग करने का कोई लागू करने योग्य अधिकार नहीं दिया।
कोर्ट के अनुसार, बैंक अक्सर ऐसे कर्मचारियों से निपटते हैं, जो अलग-अलग कैडर, विभागों और अनुशासनात्मक पदानुक्रमों से संबंधित होते हैं। ऐसी परिस्थितियों में अनिवार्य रूप से एक ही जाँच पर ज़ोर देने से गंभीर प्रशासनिक जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“इसी तरह अनुशासनात्मक प्राधिकारी भी अलग-अलग हो सकते हैं—जैसे असिस्टेंट जनरल मैनेजर, रीजनल मैनेजर, चीफ जनरल मैनेजर या एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर—जो आरोप-पत्रित कर्मचारी के कैडर के आधार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर सकते हैं। हम टी. बाबा प्रसाद (उपर्युक्त) मामले में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण की पुष्टि करते हैं। इसलिए हम 1976 के रेगुलेशंस के रेगुलेशन 10 के संबंध में विवादित फैसले में अपनाए गए दृष्टिकोण को रद्द करते हैं।”
Cause Title: CANARA BANK VERSUS PREM LATHA UPPAL (DEAD) THROUGH LRS.

