राजद्रोह कानून पर पुनर्विचार का केंद्र का आश्वासन संसद पर बाध्यकारी नहीं: BNS चुनौती पर सुप्रीम कोर्ट
Praveen Mishra
27 Feb 2026 3:19 PM IST

शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि राजद्रोह कानून की समीक्षा करने संबंधी केंद्र सरकार द्वारा दिया गया आश्वासन संसद को समान प्रावधान वाला नया कानून बनाने से नहीं रोकता।
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की कुछ धाराओं—विशेष रूप से धारा 152 (भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्य)—को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में कहा गया है कि यह प्रावधान भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124A (राजद्रोह) का पुनर्स्थापन है।
सीनियर एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि वर्ष 2022 में केंद्र सरकार ने राजद्रोह कानून की समीक्षा करने का आश्वासन दिया था और उसी वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने भी इस प्रावधान के तहत नए मामलों के पंजीकरण पर रोक लगाकर कानून को प्रभावी रूप से स्थगित कर दिया था। उन्होंने कहा, “केंद्र ने कहा था कि हम धारा 124A वापस लेंगे, लेकिन इसे फिर से लागू कर दिया गया। सरकार अदालत को आश्वासन देकर बाद में उसे पुनः लागू नहीं कर सकती।”
इस तर्क को स्वीकार नहीं करते हुए चीफ़ जस्टिस ने कहा कि कार्यपालिका द्वारा दिया गया आश्वासन संसद को बाध्य नहीं करता। उन्होंने कहा, “केंद्र सरकार ने आश्वासन दिया हो सकता है, लेकिन संसद उस से बंधी नहीं है। यह तर्क हमें प्रभावित नहीं करता कि कार्यपालिका के आश्वासन के कारण संसद कानून नहीं बना सकती। संसद पूछ सकती है कि हमारी ओर से आश्वासन देने वाले आप कौन हैं? यदि संसद कानून बनाना चाहती है तो बनाए, अदालत उसकी संवैधानिकता की जांच करेगी।”
CJI ने कहा कि कानून बनाना संसद का विशेषाधिकार है और न्यायिक समीक्षा के दौरान यदि वह संविधान के विरुद्ध पाया जाता है तो उसे निरस्त किया जा सकता है। गुरुस्वामी ने कहा कि धारा 124A IPC को लेकर अदालत ने जो चिंताएँ व्यक्त की थीं, वे BNS की धारा 152 पर भी लागू होती हैं।
इसके बाद गुरुस्वामी ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173 को चुनौती दी। उन्होंने कहा कि यह प्रावधान 'ललिता कुमारी' निर्णय का उल्लंघन करता है, क्योंकि इसमें कुछ मामलों में FIR दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच (preliminary inquiry) की अनुमति दी गई है, जबकि उस फैसले में संज्ञेय अपराध बनने पर FIR दर्ज करना अनिवार्य बताया गया था। उन्होंने कहा कि पुलिस को FIR दर्ज करने में विवेकाधिकार देना खतरनाक है।
इस पर CJI ने कहा कि 'ललिता कुमारी' फैसले का भी व्यापक दुरुपयोग हुआ है, जिससे निराधार FIR की बाढ़ आ गई। उन्होंने टिप्पणी की, “कभी-कभी फैसले 'आइवरी टावर' में बैठकर दिए जाते हैं। उस निर्णय ने कितना मुकदमेबाजी पैदा की है? संज्ञेय अपराध का खुलासा होते ही FIR दर्ज करनी होगी—इसका कितना दुरुपयोग हुआ है? कई बार न्यायालयों का भी दुरुपयोग होता है। बिना सामाजिक वास्तविकताओं और ग्रामीण परिस्थितियों को समझे अधिकारों के नाम पर फैसले दिए जाते हैं, जिससे देश की संरचना प्रभावित होती है।”
जस्टिस बागची ने कहा कि कानून 'ललिता कुमारी' फैसले पर स्थिर नहीं रह सकता। उन्होंने बताया कि उस फैसले में भी कुछ श्रेणियों में प्रारंभिक जांच की अनुमति दी गई थी और नए कानून ने केवल उन श्रेणियों का विस्तार किया है। उन्होंने कहा कि यह देखा जा सकता है कि वर्गीकरण तर्कसंगत है या नहीं, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि प्रारंभिक जांच उस निर्णय के विपरीत है।
गुरुस्वामी ने तर्क दिया कि पुलिस आरोपों की सत्यता की जांच नहीं कर सकती, जिस पर CJI ने पूछा, “फिर कौन करेगा?”
चीफ़ जस्टिस ने यह भी कहा कि नए कानून को कुछ वर्षों तक लागू रहने देना चाहिए ताकि यह देखा जा सके कि वह व्यवहार में कैसे काम करता है, उसके बाद ही हस्तक्षेप करना उचित होगा।
अंततः खंडपीठ ने मामले की सुनवाई होली अवकाश के बाद के लिए स्थगित कर दी।
मेनका गुरुस्वामी आजाद सिंह कटारिया द्वारा दायर याचिका में पेश हुईं, जबकि सीनियर एडवोकेट एस. नागमुथु मन्नारगुडी बार एसोसिएशन द्वारा दायर संबंधित याचिका में उपस्थित हुए, जिसमें BNSS के कुछ प्रावधानों को चुनौती दी गई है।

