'ज़मानत के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल आम निर्देश जारी करने के लिए नहीं किया जा सकता': सुप्रीम कोर्ट ने समन तामील पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देशों को रद्द किया
Shahadat
22 May 2026 9:45 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा ज़मानत की कार्यवाही में जारी किए गए उन निर्देशों को रद्द कर दिया, जिनमें ट्रायल कोर्ट को समन और ज़बरदस्ती की प्रक्रियाओं की तामील के लिए खास कदम उठाने को कहा गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 483 के तहत ज़मानत के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए इतने दूरगामी निर्देश जारी नहीं किए जा सकते।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने आरोपी रामबालक द्वारा दायर अपील पर यह फ़ैसला सुनाया। रामबालक ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा अपनी दूसरी ज़मानत अर्ज़ी को खारिज किए जाने को चुनौती दी थी। यह मामला 2002 के आपराधिक केस से जुड़ा था, जो IPC की धारा 419, 420, 467, 468 और 471 के तहत दर्ज किया गया।
हालांकि, तत्काल चुनौती ज़मानत न मिलने से जुड़ी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि असली मुद्दा हाईकोर्ट द्वारा ट्रायल कोर्ट को दिए गए उन निर्देशों से संबंधित था, जिनमें CrPC की धारा 62 और 69 के तहत समन जारी करने और कार्यवाही में देरी करने वाले लोगों के खिलाफ ज़बरदस्ती की कार्रवाई करने को कहा गया। ये निर्देश इलाहाबाद हाईकोर्ट के पहले के आदेशों पर आधारित थे, जो 'भंवर सिंह @ करमवीर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' और 'जितेंद्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामलों में दिए गए। इन आदेशों का मकसद समन की तामील और गवाहों को पेश करने में होने वाली व्यवस्थागत देरी को दूर करना था।
उन पिछली कार्यवाहियों में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) और पुलिस महानिदेशक से हलफनामे मांगे थे। कोर्ट ने समन की तामील और ज़बरदस्ती की प्रक्रियाओं को लागू करने में हुई नाकामियों पर चिंता जताई। उन कार्यवाहियों के आधार पर राज्य सरकार और पुलिस ने एक प्रशासनिक ढांचा लागू किया। इस ढांचे में ज़िला नोडल अधिकारी, केंद्रीय प्रक्रिया रजिस्टर, समय-समय पर निगरानी और कोर्ट की प्रक्रियाओं की तामील के लिए ज़िम्मेदार पुलिस अधिकारियों के लिए विभागीय जवाबदेही तंत्र शामिल थे। हाईकोर्ट ने उन कार्यकारी निर्देशों को लागू करने के लिए अपने ही आदेशों के तौर पर माना था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सवाल यह था कि क्या BNSS की धारा 483 के तहत ऐसे निर्देश वैध रूप से जारी किए जा सकते थे? यह धारा ज़मानत के मामलों में हाई कोर्ट और सेशन कोर्ट की शक्तियों को नियंत्रित करती है।
'उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अनुरुध (2026)' मामले में अपने हालिया फ़ैसले पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने फिर से दोहराया कि ज़मानत का अधिकार क्षेत्र सिर्फ़ यह तय करने तक सीमित है कि किसी आरोपी को ट्रायल के दौरान रिहा किया जाए या हिरासत में रखा जाए। कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि हालांकि हाईकोर्ट संवैधानिक कोर्ट हैं, फिर भी ज़मानत के प्रावधानों के तहत इस्तेमाल की जाने वाली वैधानिक शक्तियों को व्यापक संवैधानिक दर्जे का हवाला देकर क़ानून के दायरे से बाहर नहीं बढ़ाया जा सकता।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“संवैधानिक शक्ति, वैधानिक शक्ति पर हावी नहीं हो सकती, और न ही उसके दायरे को उस सीमा से आगे बढ़ा सकती है, जो क़ानून में तय की गई।”
यह मानते हुए कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र के मामले में गलती की थी, बेंच ने कहा कि विवादित निर्देशों को बरकरार नहीं रखा जा सकता।
हालांकि, कोर्ट ने यह साफ़ किया कि समन और वारंट के तामील को बेहतर बनाने के लिए उत्तर प्रदेश के अधिकारियों द्वारा पहले से उठाए गए प्रशासनिक कदम, न्यायिक निर्देशों से स्वतंत्र रूप से जारी रहेंगे; साथ ही, राज्य को यह छूट होगी कि वह मौजूदा क़ानून के अनुसार उनमें बदलाव कर सके।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि उसके इस फ़ैसले में पहले दी गई या नामंज़ूर की गई ज़मानत के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की गई। कोर्ट ने अपने 26 नवंबर, 2025 के अंतरिम आदेश की पुष्टि की, जिसके तहत अपीलकर्ता को ज़मानत पर रिहा किया गया और अपील मंज़ूर की गई।
Case : Rambalak v State of UP

