कानूनी उपायों का लाभ उठाए बिना FIR दर्ज करवाने के लिए अनुच्छेद 226 का सहारा नहीं लिया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

4 May 2026 7:55 PM IST

  • कानूनी उपायों का लाभ उठाए बिना FIR दर्ज करवाने के लिए अनुच्छेद 226 का सहारा नहीं लिया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (4 मई) को यह टिप्पणी की कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल पहली बार में FIR दर्ज करवाने का निर्देश मांगने के लिए नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने टिप्पणी की,

    "अगर किसी व्यक्ति को यह शिकायत है कि पुलिस ने उसकी FIR दर्ज नहीं की, या दर्ज होने के बाद भी ठीक से जांच नहीं की जा रही है तो आमतौर पर इसका समाधान पहली बार में रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करने में नहीं, बल्कि कानूनी ढांचे के तहत उपलब्ध उपायों का सहारा लेने में होता है। सिवाय इसके कि परिस्थितियां इतनी ज़रूरी हों कि किसी और उपाय की ज़रूरत पड़े।"

    बेंच ने उक्त टिप्पणी करते हुए हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के उस निर्देश रद्द किया, जिसमें पुलिस को शिकायतकर्ता के बयान दर्ज करने और FIR दर्ज करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए कहा गया।

    शिकायतकर्ता ने आपराधिक आरोप लगाया कि संपत्ति की पैमाइश के लिए आवेदन करते समय जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। उन अपीलकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई की मांग की, जिन्होंने कथित तौर पर राजस्व अधिकारियों के सामने कंपनी के निदेशक होने का नाटक किया ताकि ऐसी पैमाइश हो सके।

    शिकायतकर्ता कंपनी ने शुरू में भूमि अभिलेख प्राधिकरण से संपर्क किया, जिसने दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद कोई भी ज़बरदस्ती वाली कार्रवाई करने से इनकार किया। शिकायतकर्ता को उचित मंच पर जाकर समाधान खोजने की सलाह दी।

    हालांकि, इस मामले को पुलिस के संज्ञान में भी लाया गया, लेकिन कोई FIR दर्ज नहीं की गई। आपराधिक प्रक्रिया ढांचे के तहत उपलब्ध उपायों का पालन करने के बजाय, शिकायतकर्ता सीधे अनुच्छेद 226 के तहत बॉम्बे हाईकोर्ट चला गया और FIR दर्ज करने का निर्देश मांगा।

    FIR दर्ज करने का निर्देश देने वाले हाईकोर्ट के फैसले से नाराज़ होकर आरोपी व्यक्तियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

    सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य मुद्दा यह था कि क्या, भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत राज्य के अधिकारियों को FIR दर्ज करने का निर्देश दिया जा सकता है, जबकि आवेदक ने कानून में उपलब्ध वैकल्पिक उपायों का सहारा पहले न लिया हो।

    विवादित आदेश रद्द करते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फैसले में यह टिप्पणी की गई कि हाईकोर्ट ने अपने विवेकाधीन रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करते हुए FIR दर्ज करने का निर्देश देने में गलती की, जबकि कानूनी उपाय उपलब्ध थे, जिनका शिकायतकर्ताओं ने आपराधिक कानून ढांचे के तहत लाभ नहीं उठाया।

    अदालत ने टिप्पणी की,

    “मौजूदा मामले में रिकॉर्ड से यह साफ़ ज़ाहिर है कि शिकायतकर्ता कंपनी ने शुरू में 13.06.2025 और 09.07.2025 की शिकायतों के ज़रिए भूमि रिकॉर्ड प्राधिकरण से संपर्क किया, जिनकी प्रतियां पुलिस प्राधिकरण को भी भेजी गईं। हालांकि, उसने BNSS के तहत दिए गए किसी भी वैधानिक उपाय का लाभ नहीं उठाया। इसके बजाय सीधे हाईकोर्ट के रिट क्षेत्राधिकार का सहारा लिया, जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ FIR दर्ज करने के निर्देश देने की मांग की गई। हमारी सुविचारित राय में पहली बार में ऐसा कदम उठाना, कानून के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत है। विशेष रूप से तब, जब किसी व्यक्ति के जीवन या स्वतंत्रता के उल्लंघन का कोई आसन्न खतरा मौजूद न हो। अनुच्छेद 226 सभी शिकायतों का रामबाण इलाज नहीं है।”

    अदालत ने आगे कहा,

    “शिकायतकर्ता कंपनी का यह दावा नहीं है कि उसने रिट याचिका दायर करने से पहले संबंधित पुलिस अधीक्षक या मजिस्ट्रेट से संपर्क किया, और न ही रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य रखा गया, जिससे यह साबित हो सके कि ऐसे उपाय उपलब्ध नहीं थे या अप्रभावी थे। इन परिस्थितियों में किसी रिट याचिका को स्वीकार करना, असल में हाईकोर्ट को 'प्रथम दृष्ट्या मंच' (Forum of First Instance) के रूप में कार्य करने की स्थिति में ला देगा, जिससे पूरी वैधानिक व्यवस्था को ही दरकिनार किया जाएगा।”

    उपर्युक्त बातों के आधार पर अपील स्वीकार की गई और विवादित निर्णय रद्द किया गया। साथ ही शिकायतकर्ताओं को कानून के अनुसार वैकल्पिक उपायों को आज़माने की स्वतंत्रता दी गई।

    Cause Title: SUJAL VISHWAS ATTAVAR & ANR. vs. THE STATE OF MAHARASHTRA & ORS.

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