Art. 226 | ट्रिब्यूनल के बहुत ज़्यादा गलत या मनमाने फ़ैसले रद्द करने के लिए 'सर्टिओरारी' का इस्तेमाल किया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
31 Aug 2026 8:16 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (31 अगस्त) को कहा कि हाईकोर्ट संविधान के आर्टिकल 226 के तहत अपनी 'सर्टिओरारी रिट अधिकार क्षेत्र' (certiorari writ jurisdiction) का इस्तेमाल करते हुए ट्रिब्यूनल के उस आदेश में दखल दे सकते हैं जिसमें निष्कर्ष किसी भी ठोस या दस्तावेज़ी सबूत पर आधारित नहीं हैं।
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने कहा,
"अगर कोई निष्कर्ष बिना किसी सबूत या बिना किसी सहायक दस्तावेज़ के दर्ज किया जाता है तो दखल देने का मामला बनता है क्योंकि ऐसा निष्कर्ष कानून की गलती (error of law) माना जाएगा।"
बेंच ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें सोसाइटी विवाद में ट्रिब्यूनल के आदेश में दखल दिया गया, क्योंकि आर्बिट्रेटर (मध्यस्थ) का आदेश बिना किसी सहायक सबूत के पारित किया गया।
यह विवाद मूल दावेदार के इस दावे से शुरू हुआ कि वह प्रतिवादी-कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी का सदस्य बना हुआ था और उसे एक प्लॉट अलॉटमेंट का हक था।
सोसाइटी के रिकॉर्ड से पता चला कि दावेदार ने 1951 में सोसाइटी से इस्तीफ़ा दे दिया, उसका शेयर किसी दूसरे सदस्य को ट्रांसफर कर दिया गया। बाद में 1952 में उसकी सदस्यता के लिए आवेदन खारिज कर दिया गया। इसके बावजूद, आर्बिट्रेटर के तौर पर काम कर रहे रजिस्ट्रार ने बाद में मान लिया कि दावेदार सदस्य बना हुआ था और उसके कानूनी उत्तराधिकारी को प्लॉट दे दिया।
दिल्ली कोऑपरेटिव ट्रिब्यूनल ने इस फ़ैसले (अवार्ड) को बरकरार रखा। हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट ने दोनों आदेशों को रद्द किया, क्योंकि अधिकारियों ने अहम दस्तावेज़ी सबूतों को नज़रअंदाज़ किया था।
इससे नाराज़ होकर दावेदार के कानूनी प्रतिनिधियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
अपील खारिज करते हुए जस्टिस चंदुरकर द्वारा लिखे गए फ़ैसले में कहा गया कि हाईकोर्ट ने आर्बिट्रेटर के आदेश में सही दखल दिया, क्योंकि दावेदार के प्रतिवादी-सोसाइटी का सदस्य बने रहने की धारणा पर आधारित निष्कर्ष बिना किसी सहायक दस्तावेज़ के था।
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया,
“हाईकोर्ट का इन आदेशों में दखल देना पूरी तरह सही था, क्योंकि उसने माना कि अगर संबंधित दस्तावेजों पर ध्यान दिया गया होता तो फैसला सोसाइटी के पक्ष में होता। इसलिए हमारा मानना है कि हाईकोर्ट द्वारा 'सर्टिओरारी' (Certiorari) अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने में कोई गलती नहीं थी। हालांकि, 'सर्टिओरारी' अधिकार क्षेत्र के तहत दखल देने का दायरा सीमित होता है, लेकिन रिकॉर्ड से साफ तौर पर पता चलने वाली कानूनी गलती को हाई कोर्ट ठीक कर सकता है।”
आगे कहा गया,
“बिना किसी सबूत के या पूरी तरह से अंदाज़ों या अटकलों पर आधारित तथ्य-संबंधी निष्कर्ष को कानूनी गलती माना जा सकता है।”
कोर्ट ने यह बात तब कही जब उसने बताया कि क्लेम करने वाले व्यक्ति के सदस्य बने रहने के बारे में आर्बिट्रेटर का निष्कर्ष सिर्फ़ एक धारणा पर आधारित था, इसलिए उसे सही नहीं ठहराया जा सकता।
कोर्ट ने यह बात कही,
चूंकि मूल क्लेम करने वाले व्यक्ति को कभी भी सोसाइटी का सदस्य नहीं बनाया गया, इसलिए वह प्लॉट के आवंटन की मांग करने का हकदार नहीं है, इसलिए “हमारी राय में हाईकोर्ट ने 'सर्टिओरारी' अधिकार क्षेत्र के तहत दखल देते समय निष्पक्षता और न्याय (Equitable Considerations) से जुड़े पहलुओं पर भी सही ढंग से विचार किया। इस तथ्य को देखते हुए कि प्लॉट आवंटन के लिए पहले से ही चार अन्य दावेदार मौजूद थे, मूल क्लेम करने वाले व्यक्ति के दावे को सही ढंग से खारिज कर दिया गया। यह भी एक कारण है कि हाई कोर्ट के फैसले में दखल नहीं दिया जाना चाहिए।”
अपील खारिज कर दी गई।
Cause Title: SHRI PRAKASH NARAIN SHARMA DEAD THROUGH LEGAL REPRESENTATIVE VERSUS M/S. BURMAH SHELL CO-OPERATIVE RESPONDENTS HOUSING SOCIETY (REGD) THROUGH MANAGING COMMITTEE MEMBER SH. P. JINDAL AND OTHERS


