9 साल से जेल में बंद विचाराधीन कैदी ज़मानत का हकदार, क्योंकि उसके अनुच्छेद 21 के अधिकार का उल्लंघन हुआ: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
26 May 2026 8:50 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक ऐसे विचाराधीन कैदी को ज़मानत दी, जो पिछले 9 सालों से जेल में बंद था। ज़मानत देने का आधार यह था कि उसके अनुच्छेद 21 के अधिकार का उल्लंघन हुआ।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने ज़मानत देते हुए यह दोहराया कि किसी भी विचाराधीन कैदी को अनिश्चित काल तक जेल में बंद नहीं रखा जा सकता।
संक्षेप में मामला
याचिकाकर्ता को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के एक मामले में ज़मानत देने से इनकार किया था। उस पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 147, 148, 149, 120B और 302 के तहत आरोप लगे थे। सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि याचिकाकर्ता 9 साल से भी ज़्यादा समय से विचाराधीन कैदी के तौर पर जेल में है और मुक़दमा अब अपने अंतिम चरण में है। यह भी बताया गया कि इस मामले के सह-आरोपी को कोर्ट ने 29 अप्रैल को ही ज़मानत दी थी।
ज़मानत देते समय कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 'X बनाम राजस्थान राज्य (2024)' मामले में दिए गए फ़ैसले को गलत समझा, जबकि उस फ़ैसले में जस्टिस पारदीवाला भी शामिल थे। हाईकोर्ट ने यह मान लिया था कि हत्या जैसे गंभीर मामलों में एक बार मुक़दमा शुरू हो जाने के बाद उसे अपने अंतिम निष्कर्ष तक पहुँचने दिया जाना चाहिए और ऐसे मामलों में आमतौर पर ज़मानत नहीं दी जानी चाहिए।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने जवाब दिया कि हाईकोर्ट उस फ़ैसले के असली मक़सद को समझने में नाकाम रहा और उसे विचाराधीन कैदी के 'शीघ्र सुनवाई के अधिकार' पर भी विचार करना चाहिए।
यहां यह भी ध्यान देने वाली बात है कि राजस्थान से जुड़ा वह फ़ैसला एक बलात्कार के मामले से संबंधित था, जिसमें आरोपी को ज़मानत दी गई। हालांकि कोर्ट ने यह कहा था कि आमतौर पर एक बार मुक़दमा शुरू हो जाने के बाद गंभीर अपराधों में ज़मानत नहीं दी जानी चाहिए। साथ ही यह भी कहा था कि यदि मुक़दमे में आरोपी की कोई गलती न होते हुए भी बेवजह देरी हो रही हो तो उसके 'शीघ्र सुनवाई के अधिकार' की हर हाल में रक्षा की जानी चाहिए। इसे अनुच्छेद 21 के उल्लंघन का एक "गंभीर" मामला बताते हुए कोर्ट ने दोहराया था कि अपराध चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो, यदि आरोपी को त्वरित सुनवाई के अधिकार से वंचित किया जाता है और वह बिना किसी गलती के वर्षों तक जेल में सड़ता रहता है तो उसे सह-आरोपी के लिए जारी ज़मानत आदेश के आधार पर अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रखा जा सकता।
मौजूदा मामले में कोर्ट ने यह स्पष्ट करना उचित समझा कि 2024 के फैसले के सिद्धांत को हर मामले के तथ्यों के अनुसार ही समझा जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा:
"यदि कोई आरोपी एक विचाराधीन कैदी के तौर पर 9 साल से अधिक समय से जेल में है तो वह ज़मानत पर रिहा होने का हकदार है; क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निहित एक ऐसा अधिकार है, जिसका उल्लंघन होना कहा जा सकता है।"
Case Details: VICKKI YADAV @ VIKAS YADAV v. STATE OF UTTAR PRADESH|Special Leave to Appeal (Crl.) No(s). 9430/2026

