आपराधिक मामलों में अस्पष्ट मेडिकल राय निष्पक्ष सुनवाई को कमज़ोर करती है: राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य को मेडिको-लीगल गाइडलाइंस बनाने का निर्देश दिया

Shahadat

18 March 2026 4:44 PM IST

  • आपराधिक मामलों में अस्पष्ट मेडिकल राय निष्पक्ष सुनवाई को कमज़ोर करती है: राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य को मेडिको-लीगल गाइडलाइंस बनाने का निर्देश दिया

    राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे व्यापक और एक समान मेडिको-लीगल गाइडलाइंस तैयार करने और उन्हें लागू करने के निर्देश जारी करें। इन गाइडलाइंस का पालन सभी सरकारी मेडिकल अधिकारियों को करना होगा, जब वे आपराधिक मामलों में मेडिकल राय देंगे, ताकि उनकी स्पष्टता, पठनीयता, पूर्णता और असंदिग्धता सुनिश्चित हो सके।

    जस्टिस चंद्र प्रकाश श्रीमाली की बेंच ने गृह विभाग के प्रधान सचिव को आगे निर्देश दिया कि वे पुलिस विभागों को निर्धारित गाइडलाइंस का सख्ती से पालन करने का निर्देश दें। साथ ही, पुलिस अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दें कि उनके द्वारा प्राप्त सभी मेडिकल राय विशिष्ट हों और हर चोट को खतरनाक या मृत्यु का कारण बनने के लिए पर्याप्त के रूप में वर्गीकृत किया गया हो।

    कोर्ट ने कहा,

    “यह कोर्ट का कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि उसके सामने रखे गए सबूत न केवल औपचारिक रूप से स्वीकार्य हों, बल्कि मूल रूप से भी विश्वसनीय हों; विशेष रूप से उन मामलों में जहां आपराधिक दायित्व निर्धारित करने में विशेषज्ञ की राय केंद्रीय भूमिका निभाती है... इसलिए कोर्ट इसे अनिवार्य मानता है कि मेडिको-लीगल रिपोर्टिंग के एक समान मानक लागू किए जाएं। साथ ही ऐसे तंत्र भी स्थापित किए जाएं जो ऐसी रिपोर्ट जारी करने के लिए जिम्मेदार मेडिकल अधिकारियों के बीच जवाबदेही सुनिश्चित कर सकें।”

    कोर्ट हत्या के प्रयास के एक मामले में ज़मानत याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इस दौरान कोर्ट ने पाया कि मेडिकल रिपोर्ट अस्पष्ट, संदिग्ध और संदेहास्पद प्रतीत हो रही थी, क्योंकि इसमें चोटों की प्रकृति, इस्तेमाल किए गए हथियार, शरीर के जिस हिस्से पर चोट लगी थी, आदि के बारे में कोई विवरण नहीं दिया गया।

    कोर्ट ने राय दी कि मेडिकल ज्यूरिस्टों (मेडिकल एक्सपर्ट) के लिए कोई विशिष्ट गाइडलाइंस जारी नहीं की गईं, जिसके कारण अलग-अलग मामलों में विभिन्न मेडिकल ज्यूरिस्टों द्वारा प्रस्तुत मेडिकल रिपोर्टों में विसंगतियां पाई गईं। यह कहा गया कि जब मेडिको-लीगल रिपोर्टों में स्पष्टता की कमी होती थी, या वे चोट की प्रकृति या चोटों की गंभीरता के संबंध में उचित तर्क देने में विफल रहती थीं, तो कोर्ट को अक्सर समस्याओं का सामना करना पड़ता था।

    ऐसी रिपोर्टों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए यह कहा गया कि गंभीर प्रकृति के मामलों, विशेष रूप से हत्या, आत्महत्या आदि से जुड़े आपराधिक मामलों का निर्णय करते समय, डॉक्टरों की राय को महत्वपूर्ण सबूत और "परम सत्य" (Gospel Truth) माना जाता है।

    रिपोर्टों में किसी भी प्रकार के मानकीकरण (Standardization) का अभाव न केवल ऐसी राय के साक्ष्य मूल्य को कमज़ोर करता है, बल्कि आपराधिक न्याय प्रणाली की अखंडता के लिए भी गंभीर जोखिम पैदा करता है। कोर्ट ने आगे इस बात पर भी ज़ोर दिया कि ऐसी रिपोर्टों से अनुच्छेद 21 और 14 के तहत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का भी खतरा पैदा होता है।

    यह राय दी गई कि अनुच्छेद 21 निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार की गारंटी देता है। मेडिकल राय/रिपोर्टों में अस्पष्टता, पक्षों के अपने मामले का प्रभावी ढंग से बचाव करने या उसे साबित करने के अधिकारों से समझौता करती है।

    आगे कहा गया,

    “किसी आरोपी को अस्पष्ट विशेषज्ञ राय के आधार पर गलत सज़ा मिल सकती है, जबकि किसी शिकायतकर्ता को विश्वसनीय मेडिकल पुष्टि न होने के कारण न्याय से वंचित होना पड़ सकता है... इसके अलावा, अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानून के समान संरक्षण की गारंटी देता है। जहां एक पक्ष किसी अविश्वसनीय या अस्पष्ट मेडिकल रिपोर्ट के कारण लाभान्वित होता है या नुकसान उठाता है। दूसरी ओर, किसी अन्य मामले में समान स्थिति वाला कोई अन्य व्यक्ति अधिक सक्षम और विस्तृत राय से लाभान्वित होता है तो इसका परिणाम कानून के तहत असमान व्यवहार के रूप में सामने आता है। यह असमानता आपराधिक न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास को कमज़ोर करती है। यह न्यायिक विसंगतियाँ भी पैदा करती है...”

    इसी पृष्ठभूमि में मुख्य सचिव और प्रधान सचिव को उपर्युक्त निर्देश जारी किए गए।

    इसके अतिरिक्त, यह भी कहा गया कि पुलिस या स्वास्थ्य विभाग में सक्षम प्राधिकारी, किसी भी ऐसे अधिकारी के विरुद्ध प्रशासनिक या अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होंगे, जिसका आचरण मेडिको-लीगल रिपोर्टिंग के संबंध में लापरवाहीपूर्ण, टालमटोल वाला, या निर्धारित किए जाने वाले मानकों का उल्लंघन करने वाला पाया जाता है।

    Title: Gautam v State of Rajasthan

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